विटामिन `एफ´ सामान्यत: तेल युक्त बीजों में पाया जाता है।
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Tuesday, December 24, 2019
विटामिन `एफ´vitamin F Introduction, Symptoms, Causes. Requirements
विटामिन `एफ´ सामान्यत: तेल युक्त बीजों में पाया जाता है।
Tuesday, December 17, 2019
hydrocele-introduction-causes-symptom-homeopathic-medicineअंडकोष में पानी जमा होना
अंडकोष में पानी जमा होना (Hydrocele)
परिचय :- किसी कारण से अंडकोष में पानी जमा हो जाने से अंडकोष की थैली फूल जाती है जिसे हाइड्रोसिल कहते हैं। इस रोग का एक सामान्य लक्षण यह है कि पूर्णिमा व एकादशी के दिनों में यह बढ़ जाता है अर्थात अंडकोष अधिक फुल जाता है और अन्य दिनों में कम रहता है। जब अंडकोष में अधिक पानी भर जाता है तो अंडकोष गुब्बारे की तरह फुला हुआ दिखाई देता है। अंडकोष में अधिक पानी भर जाने पर कभी-कभी नश्तर लगवाकर पानी को निकलवाना पड़ता है।
कारण :- अंडकोष की सूजन या पानी भरना कई कारणों से होता है। अंडकोष पर चोट लगना, अंडकोष में दर्द होना, उसके नसों का सूज जाना, स्वास्थ्य खराब होना या सूजन आना आदि। अंडकोष की सूजन वंशानुगत भी हो सकता है। कभी-कभी अंडकोष की सूजन में दर्द बिल्कुल भी नहीं होता परन्तु वह बढ़ता रहता है।
वंशानुगत रूप से अंडकोष में पानी भरने पर औषधियों का प्रयोग :-
1. ऐब्रोटेन :- ऐब्रोटेन औषधि की 3 से 30 शक्ति का प्रयोग बच्चों के अंडकोष की सूजन को ठीक करने के लिए किया जाता है।
2. ब्रायोनिया :-
- यदि किसी बच्चे का अंडकोष जन्म से बढ़ा हुआ हो तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3 शक्ति का सेवन हर 4 घंटे के अंतर पर कराना चाहिए।
- चोट लगने के कारण अंडकोष की सूजन होने पर आर्निका 3 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
अन्य कारणों से अंडकोष बढ़ने या पानी भरने पर औषधियां का प्रयोग:-
1. आर्निका :- यदि चोट लगने के कारण अंडकोष बढ़ गया हो तो आर्निका औषधि की 12 शक्ति का सेवन 4-4 घंटे के अंतर पर करने से लाभ मिलता है।
2. ब्रायोनिया :- अंडकोष में सूजन आने पर यदि गोली लगने की तरह दर्द हो या बैठे रहने पर सुई चुभने की तरह दर्द हो तो ब्रायोनिया औषधि का उपयोग करना लाभकारी होता है।
3. ग्रैफाइटिस :-
- अंडकोष व अण्ड में सूजन आने पर ग्रैफाइटिस औषधि का प्रयोग किया जा सकता है। इस औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।
- अंडकोष की त्वचा का सूख जाना, जननेन्द्रियां सूज जाना, बाईं अंडकोष में जलन होना, अंडकोष की त्वाच पर फुन्सियां होना एवं कभी-कभी इसके साथ स्वप्नदोष होना आदि। इस तरह के लक्षणों में ग्रैफाइटिस औषधि की 6 या 30 शक्ति का सेवन करना उचित होता है।
4. रोडोडेन्ड्रन :- अंडकोष की नई सूजन में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है विशेषकर दाईं ओर के अंडकोष की सूजन में। यदि अंडकोष की नईं सूजन में दर्द हो तो ऐसे लक्षणों में रोडोडेन्ड्रन औषधि की 3x मात्रा या 6 शक्ति लेना चाहिए। यदि इस औषधि से लाभ न हो तो रस-टॉक्स औषधि का सेवन करना चाहिए।
5. साइलीशिया :-
- अंडकोष में पानी भरने या अंडकोष में सूजन आने के साथ यदि जननांगों पर पसीना आता हो, खुजली हो, सिर पर पसीना आए, रोगी का शरीर पतला-दुबला हो और वह शीत प्रकृति का हो तो उसे साइलीशिया औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।
- यदि अंडकोष की सूजन पूर्णिमा और अमावस्या को बढ़ता हो तो साइलिसिया औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
6. स्पंजिया :- यदि अंडकोष में पानी भर गया हो और वह फुलकर लाल रंग हो गया हो और ऐसा महसूस हो जैसे अंडकोष टपक पड़ेगा। इस तरह के लक्षणों में स्पंजिया औषधि के मूलार्क की 2x मात्रा या 3 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।
7. रस-टॉक्स :- बरसात के मौसम में या सर्दी के मौसम में अंडकोष में दर्द होने पर रस-टॉक्स औषधि की 30 शक्ति का उपयोग किया जा सकता है।
8. हैमामेलिस :- अंडकोष के साथ शुक्ररज्जु की शिराएं बढ़ने पर हैमामेलिस औषधि की 1x मात्रा का सेवन करना हिताकरी होता है।
9. रोडोडेन्ड्रन :- यदि अंडकोष में जल भरने की बीमारी नई हो, दाईं कोष रोगग्रस्त हो एवं दर्द हो और अंधरे या वर्षा से पहले दर्द बढ़ता हो तो ऐसे में रोडोडेन्ड्रन औषधि की 3x मात्रा या 6 शक्ति प्रयोग करना लाभकारी होता है।
10. पल्सेटिला :- इस औषधि का प्रयोग अंडकोष के रोग में किया जाता है विशेषकर बाएं अंडकोष रोगग्रस्त होने पर। यदि अंडकोष में दर्द न हो और वह धीरे-धीरे बढ़ता व फूलता जा रहा हो तो पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का सेवन करते रहने से दर्द में आराम मिलता है और सूजन दूर होती है। ऊपर बताए गए औषधियों के प्रयोग के अतिरिक्त बीच-बीच में प्रयोग की जाने वाली अन्य औषधियां :- रस-टॉक्स की 6, एपिस की 6, सल्फर की 30 या आयोड की 6 शक्ति आदि।
Sunday, December 15, 2019
लिंग का रोग, Penis Troubles INTRODUCTION, SYMPTOMS, CAUSES, HOMEOPATHIC MEDICINE
लिंग का रोग (Penis Troubles)
परिचय :- पुरुषों में एक पुरुस्थ ग्रंथि होती है जो मूत्राशय के गर्दन को चारों ओर से घेरे रहती है और उसके बीच से होकर मूत्रनली हो जाती है। मूत्राशय से एक नलिका जुड़ी होती है जो मूत्राशय में एकत्रित मूत्र को लिंग तक लाती है। पुरुषों में पुरुस्थ ग्रंथि से सम्बंधित परेशानियां 50 साल के बाद शुरू होती है। पुरुस्थग्रंथि सम्बंधित परेशानियां इस प्रकार हैं- पुरुस्थग्रंथि का बढ़ जाना, पुरुस्थग्रंथि की सूजन एवं पुरुस्थग्रंथि का कैंसर आदि।
कारण :- पुरुस्थग्रंथि बढ़ जाने का मुख्य कारण हारमोन्स में असंतुलन पैदा होना है। अधिक उम्र होना, ग्रंथि में सूजन व जलन होना एवं बैक्टीरिया संक्रमण होना आदि कारणों से भी यह रोग होता है। यह रोग मूत्रमार्ग मेंपथरी बनना, पेशाब का वापस लौट जाना, संभोग के द्वारा प्राप्त संक्रमण, ग्रंथि का कैंसर, अनुवांशीक कारण, हारमोन्स की गड़बड़ी व संभोग से होने वाले रोग आदि कारण से भी हो सकता है।
लक्षण :- अंडकोष का आकार बढ़ जाना, पेशाब का अपने आप निकल जाना, पेशाब का कुछ देर के लिए रुक जाना और फिर आने लगना, पेशाब का धीरे-धीरे निकलना, जोर लगाने पर भी पूर्ण रूप से पेशाब का निकास न होना, रात को बार-बार पेशाब करने के लिए उठना, पेशाब लाल रंग का होना आदि इस रोग के लक्षण है। मूत्रनली में जलन, बुखार, कंपकंपी, दर्द पूर्ण पुरुस्थग्रंथि, कमर के निम्न भाग में हल्का-हल्का दर्द, पेशाब करते समय दर्द होना, जननांगों पोतो और लिंग में दर्द होना, पेशाब लाल व बदबूदार आना आदि लक्षण भी रोगी में दिखाई पड़ते हैं। कैंसर होना, पेट के नीचे एक कठोर गांठ का अनुभव होना, रुक-रुक का आने वाला पेशाब, बार-बार पेशाब आना, मूत्रमार्ग का संक्रमण, शारीरिक वजन का कम होना, खून की कमी, मूत्राशय की सूजन आदि अधिकतर इस रोग में दिखाई पड़ते हैं।
लिंग में जलन, खुजली एवं दाने:-
1. कोका अथवा कोकेन :- रोगी को ऐसा अनुभव होता है जैसेकि उसका लिंग ही नहीं है। ऐसे अनुभव होने पर कोका औषधि की 3 शक्ति या कोकेनऔषधि का सेवन करना हितकारी होता है।
2. क्रियोसोट :- मैथुन के समय लिंग में जलन होना और अगले दिन लिंग पर सूजन आ जाना इस प्रकार के लक्षणों में क्रियोसोट औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।
3. मैग्नेशिया म्यूर :- लिंग में जलन और सुबह के समय लिंग बार-बार उत्तेजित होने के लक्षणों से पीड़ित रोगी को मैग्नेशिया म्यूर औषधि की 30 या 200 शक्ति का सेवन करना चाहिए।
4. पैरियारा :- यह औषधि मूत्र संस्थान पर विशेष क्रिया करती है। लिंग का अगला भाग अर्थात सुपारी में दर्द होता है, जननेन्द्रिय के पास खुजली होती है एवं मूत्रनली में सूजन आ जाती है। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को पैरियारा औषधि की 3 शक्ति का सेवन कराना चाहिए।
5. ऐगनस कैस्टस या लाइकोपोडियम :- रोगी को यदि ऐसा अनुभव होता है कि काम शक्ति नष्ट हो गई है या संभोग के समय लिंग उत्तेजित नहीं होता। ऐसे लक्षणों में ऐगनस कैस्टस औषधि की 6 शक्ति या लाइकोपोडियम औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
6. ग्रैफाइटिस :- जननेन्द्रिय पर हर्पीज जैसे दाने होने पर रोगी को ग्रैफाइटिस औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।
7. क्रोटन टिग :- जननांग पर दाने निकल आते हैं और उन पर तेज खुजली एवं जलन होती है। इस तरह के दाने युक्त खुजली व जलन को दूर करने के लिए क्रोटन टिग औषधि की 6 या 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।
8. कॉस्टिकम :- जननेन्द्रिय पर खुजली होने पर कॉस्टिकम औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन करने से लाभ मिलता है।
जननेन्द्रिय कां दर्द :-
9. इग्नेशिया :- यदि खांसते हुए जननेन्द्रिय में दर्द हो तो इग्नेशिया औषधि की 30 शक्ति या 200 शक्ति का उपयोग करना हितकारी होता है।
10. डिजिटेलिस :- वीर्यपात होने के बाद जननेन्द्रिय में दर्द होने के लक्षणों में डिजिटेलिस औषधि की 3 से 30 शक्ति के बीच की कोई भी औषधि का प्रयोग किया जा सकता है।
11. कैपसिकम :- गोनोरिया के रोग में जननेन्द्रिय में दर्द और उत्तेजना होने के लक्षणों में कैप्सिकम औषधि की 3 से 6 शक्ति का उपयोग किया जाता है।
12. नक्स-वोमिका :- सुबह के समय लिंग उत्तेजित होने के साथ दर्द होने पर नक्स-वोमिका औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
13. कैलि-कार्ब :- अधिक समय से वीर्यपात होने के कारण आई अत्यधिक कमजोरी एवं इन्द्रिय में दर्द आदि को दूर करने के लिए कैलि कार्ब औषधि की 6x मात्रा या 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
बच्चों में इन्द्रिय को खींचने की आदत :-
1. मर्क सौल :- जो बच्चे जननेन्द्रिय को खींचते रहते हैं उनके लिए मर्क सौल औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
2. कैन्थरिस :- मर्क सौल औषधि का सेवन करने से यदि लाभ न मिले तो कैन्थरिस औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।
इन्द्रिय का छोटा पड़ जाना :-
1. नूफर लूटियम :- संभोग करने की इच्छा का समाप्त हो जाना, जननेन्द्रिय का ढीलापन, पाखाने या पेशाब के समय अपने आप वीर्य पात हो जाना, प्रोस्टेट के साथ स्राव होना, अंडकोष में दर्द होना आदि। इस तरह के लक्षणों में रोगी को नूफर लूटियम औषधि की 3 से 6 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।
2 इग्नेशिया :- जननेन्द्रिय अधिक छोटा दिखाई देने पर इग्नेशिया औषधि की 30 शक्ति का सेवन करें।
3. लाइकोपोडियम :- हस्तमैथुन के कारण इन्द्रिय (लिंग) छोटा हो गया हो तो लाइकोपोडियम औषधि की 30 शक्ति का सेवन करने से फायदा मिलता है।
4. एगनस कैस्टस :- जननेन्द्रिय का ढीला होने या ठंडा पड़ जाने पर एगनस कैस्टस औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सुपारी को ढकने वाली त्वचा का पीछे न हटना :-
5. मर्क आयोडाइड :- जननेन्द्रिय के अगले भाग को ढकने वाली त्वचा का पीछे न हटने के शिकायत में मर्क आयोडाइड औषधि की 2x मात्रा का सेवन करना फायदेमंद होता है।
6. नाइट्रिक ऐसिड :- जननेन्द्रिय का अगला भाग सूज जाने के कारण सुपारी के ऊपर की त्वचा पीछे न हटती हो तो रोगी को नाइट्रिक ऐसिड औषधि की 6 शक्ति का सेवन कराना चाहिए।
7. सल्फर :- जननेन्द्रिय के अगले भाग की त्वचा पीछे न हटने के साथ उसमें पीब बनने के लक्षण दिखाई देने पर सल्फर औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
8. हिपर सल्फर :- जननेन्द्रिय में पीब बनने के साथ टपकनयुक्त दर्द होने पर हिपर सल्फर औषधि से उपचार करना चाहिए।
सुपारी या लिंग के अगले भाग में सूजन आना :-
1. ग्रैफाइटिस :- लिंग के अगले भाग पर अधिक सूजन आने और जननेन्द्रिय पर छाले पड़ जाने के लक्षणों में ग्रैफाइटिस औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना हितकारी होता है।
2. रस-टॉक्स :- सुपारी का सूजकर लाल हो जाने और उसमें दर्द होना आदि प्रकार के लक्षणों में उपचार करने के लिए रस-टॉक्स औषधि की 30 शक्ति का उपोग करना चाहिए।
3. मर्क-सौल :- लिंग का अगला भाग इतना अधिक सूज जाता है कि लिंग मुण्ड की त्वचा पीछे नहीं हटती। ऐसी स्थिति में त्वचा को पीछे हटने की कोशिश करने पर पीला या नीला पीब निकलती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को उपचार के लिए मर्क सौल औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
4. सिन्नेबेरिस :- सुपारी को ढकने वाली त्वचा में सूजन आ जाती है, उस पर मस्से हो जाते हैं और मस्से से खून बहता है या अंडकोष का बढ़ जाने के लक्षणों में उपचार करने के लिए सिन्नेबेरिस औषधि की 3x मात्रा का प्रयोग करना हितकारी होता है।
इन्द्रिय एवं लिंग की त्वचा पर खुजली होना :-
1. सिन्नेबेरिस :- इन्द्रिय एवं लिंग को ढकने वाली त्वचा पर खुजली होने के लक्षणों में सिन्नेबेरिस औषधि की 3x मात्रा का उपयोग करने से लाभ मिलता है।
2. रस-टॉक्स :- लिंग के ऊपर की त्वचा में ऐसी खुजली होना जिसे खुजलाने पर लिंग उत्तेजित हो जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को रस-टॉक्स औषधि 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।
Saturday, December 14, 2019
Online Homeopathic consultation ऑनलाइन होम्योपैथिक परामर्श
Online Homeopathic consultation
ऑनलाइन होम्योपैथिक परामर्श
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Friday, December 13, 2019
सिरदर्द (Headache) Introduction, Symptoms, Causes, Precautions, Homeopathic medicines
सिरदर्द (Headache)
परिचय- सिर में दर्द होना कई बार तो बहुत सी बीमारियों का लक्षण भी होता है। सिर-दर्द से पीड़ित बहुत से रोगियों में तेज दर्द होता है तो बहुत से में कम। इस रोग में माथे पर तेज दर्द होता है, भूख भी नहीं लगती है, मुंह लसदार हो जाता है, उल्टी आती है तथा जी भी मिचलाती है।
सिर दर्द को ठीक करने के लिए होम्योपैथी चिकित्सा के अनुसार लक्षणों के अधार पर औषधियों का चुनाव करना अधिक कठिन होता है। यदि सिर दर्द को ठीक करने के कारणों को वर्गीकरण कर लिया जाए तब ठीक औषधि का चुनाव करना आसान हो जाता है।
सिर-दर्द के कारणों को निम्न भागों में बांटा जा सकता हैं-
सिर या किसी अंग में खून जमा होने के कारण से उत्पन्न सिर दर्द (कोनगेस्टिव हैडेक)
श्लैष्मिक-झिल्ली में शोथ (जुकाम) होने से उत्पन्न सिर दर्द (केटरल हैडेक)
आधासीसी-दर्द (आधा सिर में दर्द) (हेमिक्रेनिया ओर माइग्रेन)
पाकाशय की गड़बड़ी से उत्पन्न सिर में दर्द (ग्रैस्टिक हैडेक)
वात-व्याधि के कारण से उत्पन्न सिर में दर्द (र्हेयुमेटिक हैडेक)
पित्त-प्रकृति के रोगियों का सिर में दर्द (बीलियस हैडेक)
इस प्रकार के सिर दर्द को ठीक करने के लिए औषधि का चुनाव करने के लिए कारणों को ठूंडकर और पता लगाए कि किस परिस्थिति में रोग बढ़ता है, किस में घटता है और किस प्रकार के अन्य किसी कष्ट के साथ सिर-दर्द जुड़ा हुआ रहता है। उदाहरण के लिए सिर दर्द सूर्य निकलने के साथ बढ़ता, सूर्य ढलने के साथ घटता हो, दिन को न होता हो, रात को होता हो, इसका किसी परिस्थिति के साथ सम्बंध है, कब्ज के साथ सिर दर्द होता है, चोटलगने पर सिर दर्द है या किसी कष्ट के साथ यह जुड़ा है। इसलिए इन सब कारणों और लक्षणों को समझकर ही औषधियों से सिर दर्द को ठीक करना चाहिए।
सिर-दर्द कई कारणों से होता हैं :-
अधिकतर सिर-दर्द गर्दन की पेशियों या खोपड़ी में तनाव उत्पन्न होने के कारण से होता है।
किसी चीज पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने के कारण से मस्तिष्क में खिचाव उत्पन्न होता है जिसके कारण से सिर-दर्द हो सकता है।
आंखों में थकान या दर्द होने के कारण भी सिर-दर्द होता है क्योंकि किसी चीज पर बहुत देर तक ध्यान करके देखने से दृष्टि दोष उत्पन्न होती है।
कई प्रकार के चीजों का सेवन करने से सिर-दर्द हो सकता है जैसे- शराब, पनीर तथा अन्य उत्तेजक पदार्थ।
सिर में दर्द और भी कई कारणों से होता है जैसे- मौसम परिवर्तन, हारमोन्स की गड़बड़ी तथा भावात्मक दशा।
सिर-दर्द का लक्षण :-
सिर में दर्द अचानक होता है और इसके बाद उल्टियां आती है, दृष्टि धुंधली पड़ जाती है। सिर में दर्द कभी एक भाग में होता है तो कभी पुरे भाग में। दर्द कभी प्रतिदिन एक ही समय पर होता है तो कभी अलग-अलग समय पर और कभी दर्द हल्का होता है तो कभी तेज। सिर में दर्द दृष्टि कमजोर होने के कारण से हो रहा हो या तनाव के कारण से हो रहा हो, ऐसी अवस्था में रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर के चारों ओर कोई पट्टी बंधी है और चारों तरफ हल्का-हल्का दर्द हो रहा है। साइनस रोग के होने के कारण से सिर में जलन होने के साथ दर्द महसूस होता है। आंतरिक रक्तस्राव होने के कारण से सिर में तेज दर्द होता है और ऐसा लगता है जैसे किसी ने सिर पर चोट मार दी है। मस्तिष्क में जलन होने के कारण से सिर में दर्द होता है, इस दर्द से पीड़ित जब रोगी रोशनी में जाता है तो दर्द और भी बढ़ने लगता है।
सिर-दर्द होने पर क्या करें और क्या न करें :-
सिर-दर्द से पीड़ित रोगी को शराब, पनीर, मूंगफली, कॉफी और बादाम को सेवन नहीं करना चाहिए।
सिर के आधे भाग में दर्द होता हो तो पैष्टिक खुराके लेनी चाहिए और लक्षणों के अधार पर औषधि का प्रयोग करके रोग को ठीक करना चाहिए।
रोगी के सिर में दर्द होने के अवस्था में कुछ न कुछ खाना अच्छा होता है।
सिर में दर्द फकड़न होने के साथ हो रहा हो तो माथे पर कपड़े की पट्टी बांधने से फायदा मिलता है।
सिर दर्द से पीड़ित रोगी को आराम करना चाहिए और थोड़ी मात्रा में खूब गर्म चाय या कॉफी पीना फायदामंद होता है।
सिर-दर्द होने पर चिकित्सक से सलाह लेकर उचित विटामिनों का सेवन करना चाहिए।
रोगी को कभी भी बिना चिकित्सक के सलाह लिए दवा नहीं सेवन कराना चाहिए।
यदि तनाव या चिंता-फिक्र के कारण से सिर दर्द हो रहा हो तो इन कारणों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
यदि शोरयुक्त माहौल, टी.वी. देखने या रोशनी के कारण से सिर में दर्द हो रहा हो तो इन कारणों से बचना चाहिए।
जब तक सिर दर्द ठीक नहीं हो तब तक एक अंधेरे कमरे में माथे पर पट्टी बांध कर आराम करना चाहिए।
सिर-दर्द नया होने पर औषधियों से उपचार :-
1. ब्रायो :- रोगी के सिर में दर्द नया हो तथा इसके साथ ही उल्टी आए तो रोग की चिकित्सा करने के लिए ब्रायो औषधि उपयोगी है।
2. नक्स वोमिका :- यदि रोगी का सिर-दर्द नया हो और उसके माथे में खून जमा होने के कारण से यह रोग हो गया हो तथा इसके साथ ही सिर में चक्करआ रहा हो और कब्ज की समस्या हो तो नक्स वोमिका औषधि से उपचार करना लाभकारी होता है।
3. बेल :- रोगी के सिर में दर्द होने का रोग नया हो तथा इसके साथ ही चेहरा लाल, आंखें गर्म या बड़ी महसूस हो तो बेल औषधि से उपचार करें।
4. ग्लोनाइन :- टनक जैसा दर्द हो, दर्द ऐसा महसूस हो रहा हो कि मानो सिर फट पढ़ेगा और यह रोग नया हो तो उपचार करने के लिए ग्लोनाइन औषधि का उपयोग फायेदमंद है।
5. विरे-ऐल्ब :- उल्टी आने के कारण से सिर में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही शरीर में सुस्ती आ रही हो और शरीर से ठंडा पसीना आ रहा हो तो इस रोग को ठीक करने के लिए विरे-ऐल्ब औषधि से प्रयोग करना चाहिए।
6. काक्युलस :- सिर का दर्द नया रोग हो तथा इसके साथ ही उल्टी आना, जी मिचलाना, मुंह से थोड़ा पानी और बलगम निकलना आदि लक्षण होने पर उपचार करने के लिए काक्युलस औषधि का उपयोग अधिक लाभदायक है।
7. काफिया :- स्नायुविक सिर-दर्द होने के साथ ही नींद न आने पर रोग को ठीक करने के लिए काफिया औषधि का उपयोग उचित है।
8. सिमिसिफ्यूगा :- यदि किसी स्त्री को सिर में दर्द की शिकायत हिस्टीरियां रोग के कारण से है तथा खासकर के मासिकधर्म से सम्बंधित गड़बड़ी होने के कारण से है तो रोग को ठीक करने के लिए सिमिसिफ्यूगा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
9. ऐकोन :- सर्दी लगने के कारण से सिर में दर्द हो या रक्त-संचारण में गड़बड़ी होने के कारण से सिर-दर्द हो रहा हो तो चिकित्सा करने के लिए ऐकोनऔषधि का उपयोग फायदेमंद है।
10. आइरिस :- सिर में दर्द होने के साथ ही बहुत ज्यादा पित्त की उल्टी होने पर आइरिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर-दर्द पुराना होने पर औषधियों से उपचार :-
सिर-दर्द यदि अधिक पुराना हो चुका हो तो उसे ठीक करने के लिए कैल्के-कार्ब, किनिनम-सल्फ, सल्फर, नेट्रम-म्यूर औषधियों की 3x मात्रा से 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक है।
पुराने सिर-दर्द का उपचार करने के लिए सैंगुइनेरिया, सिपिया, कैलि-बाई, कैल-कार्ब, नक्स-वोम, काक्यु, आर्स औषधियों की 6 से 30 शक्ति का उपयोग लाभकारी है।
यदि सिर-दर्द स्नायविक कमजोरी के कारण से हो और वह पुराना हो गया हो तो उसे ठीक करने के लिए जिंकम औषधि का उपयोग कर सकते हैं।
सिर-दर्द को ठीक करने के लिए लक्षणों के आधार पर
औषधियों से चिकित्सा :-
1. ऐकोनाइट :- रोगी के शरीर में रक्त-संचय होने के कारण से पैदा हुए सिर-दर्द तथा यह तेज दर्द हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि सिर फटा जा रहा है। इस प्रकार के लक्षण रोगी में हो तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की 6 से 30 शक्ति का उपयोग कर सकते हैं। सिर के आधे भाग में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही कभी-कभी माथे पर और कनपट्टी पर और यहां तक कि आंखों पर भी दर्द हो रहा हो तो उपचार करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की 6 से 30 शक्ति उपयोगी है। सिर दर्द हो रहा हो तथा हिलने-डुलने, सिर को झुकाने पर दर्द और तेज हो जाता है और आराम करने पर कुछ दर्द कम होता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की 6 से 30 शक्ति अत्यंत लाभकारी है।
2. जेलसिमियम :- रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही चारों ओर अंधेरा दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि वह अंध हो गया है। रोगी का सिर गर्म होता है और गर्दन में अधिक दर्द होता है। सिर के पीछे की ओर गर्दन में दर्द अधिक होता है। रोगी का चेहरा और आंखें लाल पड़ जाती है और दर्द के कारण से रोगी बिल्कुल ही घबड़ा जाता है और सिर सुन्न हो जाता है। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिएजेलसिमियम औषधि की 3 शक्ति का उपयोग लाभदायक है।
3. बेलेडोना :- सिर में टपक होने के समान दर्द होना, रोशनी या कोई आवाज बिल्कुल सहन न होना, सिर में तेज दर्द होना, दर्द एकाएक शुरू और बंद होता है। रोगी का चेहरा एकदम लाल हो जाता है और गर्म हो जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए बेलेडोना औषधि की 3, 6 या 30 शक्ति का उपयोग किया जा सकता है।
4. मेलिलोटस :- रक्त-संचय होने के कारण से तेज सिर में दर्द होता है, ऐसा महसूस होता है कि सिर फट रहा है। सिर-दर्द के कारण से रोगी दु:खी होकर अपने माथा को पटकने लगता है या पागलों की तरह प्रलाप करने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग का उपचार करने के लिएमेलिलोटस औषधि की मदरटिंचार तथा 1x मात्रा दो से एक दिन तक उपयोग करने फायदा मिलता है।
5. क्रोटेलस :- रोगी के सिर में दर्द होता है और वह चुपचाप पड़ा रहता है या रोगी लगड़ाकर चलता है। रोगी जब जोर से चलता है या कुछ बड़बड़ाता है या घूमता है तो उसकी तकलीफ कम हो जाती है। रोगी की ऐसी अवस्था में उपचार करने के लिए क्रोटेलस औषधि की 6 शक्ति का उपयोग कर सकते हैं।
6. आर्निका :- रोगी के सिर में खून जामा होने तथा स्नायुविक कमजोरी के कारण से दर्द हो रहा हो, आंखों की पलकें भारी महसूस हो रही हो, आंखों के आगे अंधेरा-अंधेरा दिखाई दे, आंखें लाल, आंखों में जलन, सिर गर्म रहना, कनपटी, सिर और गर्दन में अकड़न होना, रोशनी, ऊंची आवाज, हिलना-डुलना और सोने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो और शांत रहने से रोग के लक्षण कम होना आदि प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्निका औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करने से फायदा मिलता है।
7. इग्नेशिया :- रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही उसे हर कम में जल्दी लगी रहती है, चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है, रोगी के सिर में दर्द मानसिक उत्तेजना के कारण से होता है। रोगी के सिर में दर्द दु:ख के कारण से होता है। तिल्ली बढ़ने के रोग से पीड़ित रोगी के सिर में दर्द हो, रोगी के सिर में ऐसा दर्द हो कि जैसे सिर में कील गाड़ी जा रही है और दर्द एक ही तरफ रुका रहता है। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए इग्नेशिया औषधि की 3, 6 या 30 शक्ति की मात्रा का उपयोग किया जाता है।
8. नाइट्रिक एसिड :- सिर के पीछे के भाग में दर्द होने पर उपचार करने के लिए नाइट्रिक एसिड औषधि का उपयोग लाभकारी है।
9. मैग्नशिया-फास :- यदि रोगी के सिर में इतना तेज दर्द हो रहा हो कि जो सहन न हो सके, दर्द रोग के सिर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता रहता हो, कभी-कभी दर्द ठीक हो जाता हो और तो कभी ठीक होकर दूबारे से होने लगता है। ऐसे पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नशिया-फास औषधि की 2x या 12x मात्रा का प्रयोग करना फायदेमंद है।
10. ब्रायोनिया :-
सिर में खून जमा होने के कारण से सिर में दर्द होने लगता है, सिर में चक्कर आता है, सिर ज्यादा भारी महसूस होता है, सिर को झुकाने से ऐसा महसूस होता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर की सारी चीजें बाहर निकल पड़ेगी, माथे और कनपटी पर दर्द होता है, सिर को दबाने से दर्द महसूस होता है, सिर के आधे भाग में कभी-कभी दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3, 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।
रोगी को बार-बार डकारें आती है तथा कब्ज की समस्या होती है और पित्त की उल्टी होती है तथा इसके साथ ही सिर में दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3, 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग लाभदायक है।
रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही नाक से खून बहने लगता है, सिर में दर्द ऐसा होता है कि मानो वह फट जाएगा। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3 शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।
11. कैल्केरिया-कार्ब :- रोगी के सिर में दर्द अधिक मानसिक चिंता के कारण से होता है, सिर में जोर का दर्द होता है, रात में शरीर के ऊपरी अंग से बहुत अधिक पसीना निकलता है, खाली पेट रहने से बार-बार डकारें आती है और दिमाग में ठंड महसूस होती है तथा आधे सिर में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए कैल्केरिया-कार्ब औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करना उचित है।
12. चायना :- रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही कान में गुनगुन शब्द सुनाई पड़ता है, चेहरा लाल हो जाता है और शरीर बहुत अधिक कमजोर हो जाती है तथा बार-बार जंहाई आती रहती है। ऐसे रोगी के रोग की चिकित्सा करने के लिए चायना औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग किया जाता है।
13. सल्फर :-
रोगी के कपाल या कान के पीछे टपक के समान दर्द होता है, माथे के ऊपरी भाग में गर्मी महसूस होती है, सुबह के समय पतले दस्त आते हैं। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए उसे सल्फर औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का सेवन करायें।
बवासीर रोग से पीड़ित रोगी में खून का स्राव रुक जाने के कारण से मस्तिष्क में खून जमा होकर सिर में चक्कर आने के साथ दर्द हो रहा हो तोसल्फर औषधि से उपचार करना अधिक लाभकारी है।
14. लिलियम-टिग :-
रोगी के सिर के ऊपर के भाग में दर्द होता है और भार महसूस होता है, दोनों हाथों से माथा पकड़े रखने की इच्छा होती है, बाएं कपाल से लेकर सिर के पिछले भाग तक दर्द होता है, सुबह के समय में पतले दस्त होने के साथ ही सिर भारी लगता है, बंद गर्म कमरे में दर्द बढ़ने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिलियम-टिग औषधि की 6 शक्ति का उपयोग कर सकते हैं।
रोगी स्त्री के मासिकधर्म में गड़बड़ी होने के कारण से सिर में दर्द होता है, खुली हवा में और सूर्यास्त के बाद दर्द कुछ कम होता है। ऐसी स्त्री के रोग का उपचार करने के लिए लिलियम-टिग औषधि की 6 शक्ति की मात्रा का उपयोग लाभकारी है।
स्त्रियों में गर्भाशय में किसी प्रकार का रोग होने के कारण से सिर में दर्द होता है। स्त्रियों के इस प्रकार के कष्ट को दूर करने के लिए लिलियम-टिग औषधि का उपयोग करना चाहिए।
15. नक्स-वोमिका :-
सिर में चक्कर आता है, माथे पर और कनपटी की शिराओं में फड़कन होती है, फड़कन होने के साथ ही दर्द होता है, उल्टी आती है, कब्ज की समस्या होती है और भोजन करने के बाद, मानसिक परिश्रम करने के बाद और सिर झुकने पर दर्द बढ़ने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए नक्स-वोमिका औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति की मात्रा का उपयोग लाभकारी है।
बलगम या रक्त-प्रधान मनुष्यों के सिर में दर्द होता है तथा आधे सिर में दर्द होता है, सुबह के समय में दर्द तेज होता है तथा शाम के समय में दर्द कम हो जाता है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए नक्स-वोमिका औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करने से फायदा मिलता है।
पाचनयंत्र में गड़बड़ी होने के कारण, बवासीर की वजह से सिर-दर्द हो या शराबियों के सिर में दर्द हो तो ऐसे रोगियों के रोग को ठीक करने के लिए नक्स-वोमिका औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।
16. विरेट्रम-विर :- सिर-दर्द होने के साथ ही सिर में भारीपन महसूस होता है, सिर के कई शिराओं में फड़कन होती है तथा बेहोशीपन होने के साथ ही कान में भों-भों की आवाजें सुनाई पड़ती है, अतिसार होने के साथ ही उल्टी आती है और जी मिचलाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए विरेट्रम-विर औषधि 3ग या 30 शक्ति का उपयोग करना अधिक फायदेमंद है।
परिचय- सिर में दर्द होना कई बार तो बहुत सी बीमारियों का लक्षण भी होता है। सिर-दर्द से पीड़ित बहुत से रोगियों में तेज दर्द होता है तो बहुत से में कम। इस रोग में माथे पर तेज दर्द होता है, भूख भी नहीं लगती है, मुंह लसदार हो जाता है, उल्टी आती है तथा जी भी मिचलाती है।
सिर दर्द को ठीक करने के लिए होम्योपैथी चिकित्सा के अनुसार लक्षणों के अधार पर औषधियों का चुनाव करना अधिक कठिन होता है। यदि सिर दर्द को ठीक करने के कारणों को वर्गीकरण कर लिया जाए तब ठीक औषधि का चुनाव करना आसान हो जाता है।
सिर-दर्द के कारणों को निम्न भागों में बांटा जा सकता हैं-
सिर या किसी अंग में खून जमा होने के कारण से उत्पन्न सिर दर्द (कोनगेस्टिव हैडेक)
श्लैष्मिक-झिल्ली में शोथ (जुकाम) होने से उत्पन्न सिर दर्द (केटरल हैडेक)
आधासीसी-दर्द (आधा सिर में दर्द) (हेमिक्रेनिया ओर माइग्रेन)
पाकाशय की गड़बड़ी से उत्पन्न सिर में दर्द (ग्रैस्टिक हैडेक)
वात-व्याधि के कारण से उत्पन्न सिर में दर्द (र्हेयुमेटिक हैडेक)
पित्त-प्रकृति के रोगियों का सिर में दर्द (बीलियस हैडेक)
इस प्रकार के सिर दर्द को ठीक करने के लिए औषधि का चुनाव करने के लिए कारणों को ठूंडकर और पता लगाए कि किस परिस्थिति में रोग बढ़ता है, किस में घटता है और किस प्रकार के अन्य किसी कष्ट के साथ सिर-दर्द जुड़ा हुआ रहता है। उदाहरण के लिए सिर दर्द सूर्य निकलने के साथ बढ़ता, सूर्य ढलने के साथ घटता हो, दिन को न होता हो, रात को होता हो, इसका किसी परिस्थिति के साथ सम्बंध है, कब्ज के साथ सिर दर्द होता है, चोटलगने पर सिर दर्द है या किसी कष्ट के साथ यह जुड़ा है। इसलिए इन सब कारणों और लक्षणों को समझकर ही औषधियों से सिर दर्द को ठीक करना चाहिए।
सिर-दर्द कई कारणों से होता हैं :-
अधिकतर सिर-दर्द गर्दन की पेशियों या खोपड़ी में तनाव उत्पन्न होने के कारण से होता है।
किसी चीज पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने के कारण से मस्तिष्क में खिचाव उत्पन्न होता है जिसके कारण से सिर-दर्द हो सकता है।
आंखों में थकान या दर्द होने के कारण भी सिर-दर्द होता है क्योंकि किसी चीज पर बहुत देर तक ध्यान करके देखने से दृष्टि दोष उत्पन्न होती है।
कई प्रकार के चीजों का सेवन करने से सिर-दर्द हो सकता है जैसे- शराब, पनीर तथा अन्य उत्तेजक पदार्थ।
सिर में दर्द और भी कई कारणों से होता है जैसे- मौसम परिवर्तन, हारमोन्स की गड़बड़ी तथा भावात्मक दशा।
सिर-दर्द का लक्षण :-
सिर में दर्द अचानक होता है और इसके बाद उल्टियां आती है, दृष्टि धुंधली पड़ जाती है। सिर में दर्द कभी एक भाग में होता है तो कभी पुरे भाग में। दर्द कभी प्रतिदिन एक ही समय पर होता है तो कभी अलग-अलग समय पर और कभी दर्द हल्का होता है तो कभी तेज। सिर में दर्द दृष्टि कमजोर होने के कारण से हो रहा हो या तनाव के कारण से हो रहा हो, ऐसी अवस्था में रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर के चारों ओर कोई पट्टी बंधी है और चारों तरफ हल्का-हल्का दर्द हो रहा है। साइनस रोग के होने के कारण से सिर में जलन होने के साथ दर्द महसूस होता है। आंतरिक रक्तस्राव होने के कारण से सिर में तेज दर्द होता है और ऐसा लगता है जैसे किसी ने सिर पर चोट मार दी है। मस्तिष्क में जलन होने के कारण से सिर में दर्द होता है, इस दर्द से पीड़ित जब रोगी रोशनी में जाता है तो दर्द और भी बढ़ने लगता है।
सिर-दर्द होने पर क्या करें और क्या न करें :-
सिर-दर्द से पीड़ित रोगी को शराब, पनीर, मूंगफली, कॉफी और बादाम को सेवन नहीं करना चाहिए।
सिर के आधे भाग में दर्द होता हो तो पैष्टिक खुराके लेनी चाहिए और लक्षणों के अधार पर औषधि का प्रयोग करके रोग को ठीक करना चाहिए।
रोगी के सिर में दर्द होने के अवस्था में कुछ न कुछ खाना अच्छा होता है।
सिर में दर्द फकड़न होने के साथ हो रहा हो तो माथे पर कपड़े की पट्टी बांधने से फायदा मिलता है।
सिर दर्द से पीड़ित रोगी को आराम करना चाहिए और थोड़ी मात्रा में खूब गर्म चाय या कॉफी पीना फायदामंद होता है।
सिर-दर्द होने पर चिकित्सक से सलाह लेकर उचित विटामिनों का सेवन करना चाहिए।
रोगी को कभी भी बिना चिकित्सक के सलाह लिए दवा नहीं सेवन कराना चाहिए।
यदि तनाव या चिंता-फिक्र के कारण से सिर दर्द हो रहा हो तो इन कारणों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
यदि शोरयुक्त माहौल, टी.वी. देखने या रोशनी के कारण से सिर में दर्द हो रहा हो तो इन कारणों से बचना चाहिए।
जब तक सिर दर्द ठीक नहीं हो तब तक एक अंधेरे कमरे में माथे पर पट्टी बांध कर आराम करना चाहिए।
सिर-दर्द नया होने पर औषधियों से उपचार :-
1. ब्रायो :- रोगी के सिर में दर्द नया हो तथा इसके साथ ही उल्टी आए तो रोग की चिकित्सा करने के लिए ब्रायो औषधि उपयोगी है।
2. नक्स वोमिका :- यदि रोगी का सिर-दर्द नया हो और उसके माथे में खून जमा होने के कारण से यह रोग हो गया हो तथा इसके साथ ही सिर में चक्करआ रहा हो और कब्ज की समस्या हो तो नक्स वोमिका औषधि से उपचार करना लाभकारी होता है।
3. बेल :- रोगी के सिर में दर्द होने का रोग नया हो तथा इसके साथ ही चेहरा लाल, आंखें गर्म या बड़ी महसूस हो तो बेल औषधि से उपचार करें।
4. ग्लोनाइन :- टनक जैसा दर्द हो, दर्द ऐसा महसूस हो रहा हो कि मानो सिर फट पढ़ेगा और यह रोग नया हो तो उपचार करने के लिए ग्लोनाइन औषधि का उपयोग फायेदमंद है।
5. विरे-ऐल्ब :- उल्टी आने के कारण से सिर में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही शरीर में सुस्ती आ रही हो और शरीर से ठंडा पसीना आ रहा हो तो इस रोग को ठीक करने के लिए विरे-ऐल्ब औषधि से प्रयोग करना चाहिए।
6. काक्युलस :- सिर का दर्द नया रोग हो तथा इसके साथ ही उल्टी आना, जी मिचलाना, मुंह से थोड़ा पानी और बलगम निकलना आदि लक्षण होने पर उपचार करने के लिए काक्युलस औषधि का उपयोग अधिक लाभदायक है।
7. काफिया :- स्नायुविक सिर-दर्द होने के साथ ही नींद न आने पर रोग को ठीक करने के लिए काफिया औषधि का उपयोग उचित है।
8. सिमिसिफ्यूगा :- यदि किसी स्त्री को सिर में दर्द की शिकायत हिस्टीरियां रोग के कारण से है तथा खासकर के मासिकधर्म से सम्बंधित गड़बड़ी होने के कारण से है तो रोग को ठीक करने के लिए सिमिसिफ्यूगा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
9. ऐकोन :- सर्दी लगने के कारण से सिर में दर्द हो या रक्त-संचारण में गड़बड़ी होने के कारण से सिर-दर्द हो रहा हो तो चिकित्सा करने के लिए ऐकोनऔषधि का उपयोग फायदेमंद है।
10. आइरिस :- सिर में दर्द होने के साथ ही बहुत ज्यादा पित्त की उल्टी होने पर आइरिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर-दर्द पुराना होने पर औषधियों से उपचार :-
सिर-दर्द यदि अधिक पुराना हो चुका हो तो उसे ठीक करने के लिए कैल्के-कार्ब, किनिनम-सल्फ, सल्फर, नेट्रम-म्यूर औषधियों की 3x मात्रा से 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक है।
पुराने सिर-दर्द का उपचार करने के लिए सैंगुइनेरिया, सिपिया, कैलि-बाई, कैल-कार्ब, नक्स-वोम, काक्यु, आर्स औषधियों की 6 से 30 शक्ति का उपयोग लाभकारी है।
यदि सिर-दर्द स्नायविक कमजोरी के कारण से हो और वह पुराना हो गया हो तो उसे ठीक करने के लिए जिंकम औषधि का उपयोग कर सकते हैं।
सिर-दर्द को ठीक करने के लिए लक्षणों के आधार पर
औषधियों से चिकित्सा :-
1. ऐकोनाइट :- रोगी के शरीर में रक्त-संचय होने के कारण से पैदा हुए सिर-दर्द तथा यह तेज दर्द हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि सिर फटा जा रहा है। इस प्रकार के लक्षण रोगी में हो तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की 6 से 30 शक्ति का उपयोग कर सकते हैं। सिर के आधे भाग में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही कभी-कभी माथे पर और कनपट्टी पर और यहां तक कि आंखों पर भी दर्द हो रहा हो तो उपचार करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की 6 से 30 शक्ति उपयोगी है। सिर दर्द हो रहा हो तथा हिलने-डुलने, सिर को झुकाने पर दर्द और तेज हो जाता है और आराम करने पर कुछ दर्द कम होता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की 6 से 30 शक्ति अत्यंत लाभकारी है।
2. जेलसिमियम :- रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही चारों ओर अंधेरा दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि वह अंध हो गया है। रोगी का सिर गर्म होता है और गर्दन में अधिक दर्द होता है। सिर के पीछे की ओर गर्दन में दर्द अधिक होता है। रोगी का चेहरा और आंखें लाल पड़ जाती है और दर्द के कारण से रोगी बिल्कुल ही घबड़ा जाता है और सिर सुन्न हो जाता है। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिएजेलसिमियम औषधि की 3 शक्ति का उपयोग लाभदायक है।
3. बेलेडोना :- सिर में टपक होने के समान दर्द होना, रोशनी या कोई आवाज बिल्कुल सहन न होना, सिर में तेज दर्द होना, दर्द एकाएक शुरू और बंद होता है। रोगी का चेहरा एकदम लाल हो जाता है और गर्म हो जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए बेलेडोना औषधि की 3, 6 या 30 शक्ति का उपयोग किया जा सकता है।
4. मेलिलोटस :- रक्त-संचय होने के कारण से तेज सिर में दर्द होता है, ऐसा महसूस होता है कि सिर फट रहा है। सिर-दर्द के कारण से रोगी दु:खी होकर अपने माथा को पटकने लगता है या पागलों की तरह प्रलाप करने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग का उपचार करने के लिएमेलिलोटस औषधि की मदरटिंचार तथा 1x मात्रा दो से एक दिन तक उपयोग करने फायदा मिलता है।
5. क्रोटेलस :- रोगी के सिर में दर्द होता है और वह चुपचाप पड़ा रहता है या रोगी लगड़ाकर चलता है। रोगी जब जोर से चलता है या कुछ बड़बड़ाता है या घूमता है तो उसकी तकलीफ कम हो जाती है। रोगी की ऐसी अवस्था में उपचार करने के लिए क्रोटेलस औषधि की 6 शक्ति का उपयोग कर सकते हैं।
6. आर्निका :- रोगी के सिर में खून जामा होने तथा स्नायुविक कमजोरी के कारण से दर्द हो रहा हो, आंखों की पलकें भारी महसूस हो रही हो, आंखों के आगे अंधेरा-अंधेरा दिखाई दे, आंखें लाल, आंखों में जलन, सिर गर्म रहना, कनपटी, सिर और गर्दन में अकड़न होना, रोशनी, ऊंची आवाज, हिलना-डुलना और सोने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो और शांत रहने से रोग के लक्षण कम होना आदि प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्निका औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करने से फायदा मिलता है।
7. इग्नेशिया :- रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही उसे हर कम में जल्दी लगी रहती है, चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है, रोगी के सिर में दर्द मानसिक उत्तेजना के कारण से होता है। रोगी के सिर में दर्द दु:ख के कारण से होता है। तिल्ली बढ़ने के रोग से पीड़ित रोगी के सिर में दर्द हो, रोगी के सिर में ऐसा दर्द हो कि जैसे सिर में कील गाड़ी जा रही है और दर्द एक ही तरफ रुका रहता है। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए इग्नेशिया औषधि की 3, 6 या 30 शक्ति की मात्रा का उपयोग किया जाता है।
8. नाइट्रिक एसिड :- सिर के पीछे के भाग में दर्द होने पर उपचार करने के लिए नाइट्रिक एसिड औषधि का उपयोग लाभकारी है।
9. मैग्नशिया-फास :- यदि रोगी के सिर में इतना तेज दर्द हो रहा हो कि जो सहन न हो सके, दर्द रोग के सिर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता रहता हो, कभी-कभी दर्द ठीक हो जाता हो और तो कभी ठीक होकर दूबारे से होने लगता है। ऐसे पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नशिया-फास औषधि की 2x या 12x मात्रा का प्रयोग करना फायदेमंद है।
10. ब्रायोनिया :-
सिर में खून जमा होने के कारण से सिर में दर्द होने लगता है, सिर में चक्कर आता है, सिर ज्यादा भारी महसूस होता है, सिर को झुकाने से ऐसा महसूस होता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर की सारी चीजें बाहर निकल पड़ेगी, माथे और कनपटी पर दर्द होता है, सिर को दबाने से दर्द महसूस होता है, सिर के आधे भाग में कभी-कभी दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3, 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।
रोगी को बार-बार डकारें आती है तथा कब्ज की समस्या होती है और पित्त की उल्टी होती है तथा इसके साथ ही सिर में दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3, 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग लाभदायक है।
रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही नाक से खून बहने लगता है, सिर में दर्द ऐसा होता है कि मानो वह फट जाएगा। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3 शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।
11. कैल्केरिया-कार्ब :- रोगी के सिर में दर्द अधिक मानसिक चिंता के कारण से होता है, सिर में जोर का दर्द होता है, रात में शरीर के ऊपरी अंग से बहुत अधिक पसीना निकलता है, खाली पेट रहने से बार-बार डकारें आती है और दिमाग में ठंड महसूस होती है तथा आधे सिर में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए कैल्केरिया-कार्ब औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करना उचित है।
12. चायना :- रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही कान में गुनगुन शब्द सुनाई पड़ता है, चेहरा लाल हो जाता है और शरीर बहुत अधिक कमजोर हो जाती है तथा बार-बार जंहाई आती रहती है। ऐसे रोगी के रोग की चिकित्सा करने के लिए चायना औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग किया जाता है।
13. सल्फर :-
रोगी के कपाल या कान के पीछे टपक के समान दर्द होता है, माथे के ऊपरी भाग में गर्मी महसूस होती है, सुबह के समय पतले दस्त आते हैं। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए उसे सल्फर औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का सेवन करायें।
बवासीर रोग से पीड़ित रोगी में खून का स्राव रुक जाने के कारण से मस्तिष्क में खून जमा होकर सिर में चक्कर आने के साथ दर्द हो रहा हो तोसल्फर औषधि से उपचार करना अधिक लाभकारी है।
14. लिलियम-टिग :-
रोगी के सिर के ऊपर के भाग में दर्द होता है और भार महसूस होता है, दोनों हाथों से माथा पकड़े रखने की इच्छा होती है, बाएं कपाल से लेकर सिर के पिछले भाग तक दर्द होता है, सुबह के समय में पतले दस्त होने के साथ ही सिर भारी लगता है, बंद गर्म कमरे में दर्द बढ़ने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिलियम-टिग औषधि की 6 शक्ति का उपयोग कर सकते हैं।
रोगी स्त्री के मासिकधर्म में गड़बड़ी होने के कारण से सिर में दर्द होता है, खुली हवा में और सूर्यास्त के बाद दर्द कुछ कम होता है। ऐसी स्त्री के रोग का उपचार करने के लिए लिलियम-टिग औषधि की 6 शक्ति की मात्रा का उपयोग लाभकारी है।
स्त्रियों में गर्भाशय में किसी प्रकार का रोग होने के कारण से सिर में दर्द होता है। स्त्रियों के इस प्रकार के कष्ट को दूर करने के लिए लिलियम-टिग औषधि का उपयोग करना चाहिए।
15. नक्स-वोमिका :-
सिर में चक्कर आता है, माथे पर और कनपटी की शिराओं में फड़कन होती है, फड़कन होने के साथ ही दर्द होता है, उल्टी आती है, कब्ज की समस्या होती है और भोजन करने के बाद, मानसिक परिश्रम करने के बाद और सिर झुकने पर दर्द बढ़ने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए नक्स-वोमिका औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति की मात्रा का उपयोग लाभकारी है।
बलगम या रक्त-प्रधान मनुष्यों के सिर में दर्द होता है तथा आधे सिर में दर्द होता है, सुबह के समय में दर्द तेज होता है तथा शाम के समय में दर्द कम हो जाता है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए नक्स-वोमिका औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करने से फायदा मिलता है।
पाचनयंत्र में गड़बड़ी होने के कारण, बवासीर की वजह से सिर-दर्द हो या शराबियों के सिर में दर्द हो तो ऐसे रोगियों के रोग को ठीक करने के लिए नक्स-वोमिका औषधि की 6, 12 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।
16. विरेट्रम-विर :- सिर-दर्द होने के साथ ही सिर में भारीपन महसूस होता है, सिर के कई शिराओं में फड़कन होती है तथा बेहोशीपन होने के साथ ही कान में भों-भों की आवाजें सुनाई पड़ती है, अतिसार होने के साथ ही उल्टी आती है और जी मिचलाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए विरेट्रम-विर औषधि 3ग या 30 शक्ति का उपयोग करना अधिक फायदेमंद है।
Gall stone or biliary calculus, Reason. Symptoms, precautions and Homeopathic medicine पित्त पथरी
पित्त पथरी (Gall stone or biliary calculus)
परिचय :- जब पित्तकोष या पित्तवाहीनली में खाने-पीने के दोष से पैदा हुए पित्तरस जमा होकर पत्थर की तरह सख्त हो जाता है तो उसे पित्त पथरी कहते हैं। पित्त पथरी छोटी, सामान्य और बड़ी हो सकती है। पथरी काली, हरी या खाकी रंग की होती है। पित्त पथरी होने पर जो दर्द उत्पन्न होता है उसे पित्तशूल कहते हैं।
लक्षण :-
पथरी रोग होने पर पेट में हल्का या तेज दर्द होता रहता है। पथरी बनने के बाद जब तक वह पित्तकोष में रहती है तब तक रोगी को कोई कष्ट नहीं होता लेकिन कभी-कभी पेट में हल्का दर्द होता है। जब यह पथरी पित्तकोष से निकलकर पित्तवाहीनली में आ जाती है तो धीरे-धीरे दर्द शुरू होता है। इसके बाद कभी हल्का और कभी तेज दर्द होता है जिसके कारण रोगी परेशान रहता है।
पित्तशूल में दर्द दाएं कोख से शुरू होकर चारों ओर फैल जाता है विशेषकर दाएं कंधे और पीठ तक। इस तरह उत्पन्न पित्तशूल के कारण उल्टी आना, ठंड लगना, पसीना आना, कमजोरी, हिमांग, पीलिया, सांस लेने में परेशानी, बेहोशी आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। जब पित्त पथरी का दर्द शुरू होता है तो कभी-कभी दर्द कुछ घंटे के बाद ही ठीक हो जाता है लेकिन कभी-कभी यह दर्द कई सप्ताहों तक बना रहता है और जब यह पथरी आंत में आ जाती है तो अपने आप दर्द खत्म हो जाता है। आंत में पित्त-पथरी आने के बाद पथरी के कण मल के साथ बार निकल जाते हैं।
पित्त-पथरी का दर्द :-
पित्त-पथरी में दर्द के साथ उल्टी होने का लक्षण नहीं होता है और इसमें दर्द शुरू होने पर रोगग्रस्त अंगों पर गर्म सिंकाई करने या गर्म जायतूनका तेल लगाने से कुछ आराम मिलता है।
मूत्र-पथरी का दर्द :-
मूत्र-पथरी का दर्द पेशाब की नली से शुरू होकर अण्डकोष तक फैल जाता है। रोगी को बार-बार पेशाब करने की इच्छा होती है और पेशाब के साथ खून भी आता है। मूत्र-पथरी के रोगी को पीलिया रोग नहीं होता है।
पित्त पथरी होने पर उसके दर्द को दूर करने लिए तुरंत उपचार करना चाहिए। उपचार करते समय ध्यान रखें कि पित्त पथरी आंतों में से उतर कर मल के द्वारा बाहर निकल जाए और फिर कभी पित्त कोष में न बनें। पथरी को दूर करने के एक उचित आहार लेना आवश्यक है। पथरी के रोगी को भोजन ऐसा लेना चाहिए जो पथरी को गलाने के साथ-साथ शरीर को पूर्ण पोशण भी दें।
विभिन्न औषधी से रोग का उपचार
1. कार्डूयस-मेरियेनस :- पित्त पथरी में दर्द होने के साथ जिगर में भी दर्द होता है विशेषकर जिगर के बाएं भाग में। ऐसे दर्द को दूर करने के लिएकार्डूयस-मेरियेनस- मदर टिंचर औषधि 5 से 10 बूंद की मात्रा में प्रतिदिन 3-3 घंटे के अंतर पर सेवन करना चाहिए।
2. डायोस्कोरिया :- यदि पित्त पथरी का दर्द पित्त कोष से शुरू होकर चारों ओर फैलता हो और चलने-फिरने या मुड़ने से दर्द में आराम मिलता हो तो ऐसे दर्द में डायस्कोरिया औषधि के मूलार्क या 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। यदि दर्द आगे की ओर झुकने से शांत होता हो तो कोलोसिन्थ औषधि का उपयोग उचित होता है।
3. कैल्के-कार्ब या बार्बेरिस :- पित्त-पथरी के दर्द को दूर करने के लिए कैल्के-कार्ब औषधि की 30 से 200 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है। पित्तशूल में यह औषधि 15-15 मिनट के अंतर पर 3 घंटे तक सेवन करना चाहिए। इस औषधि का 3 घंटे तक सेवन करने के बाद भी दर्द में आराम न मिले तो बार्बेरिस- मदर टिंचर औषधि का सेवन 20-20 मिनट के अंतर पर करना चाहिए।
4. आर्निका :- पित्त पथरी के किसी भी लक्षणों में आर्निका औषधि की 3X मात्रा या 6 शक्ति प्रयोग किया जा सकता है। इस औषधि के प्रयोग से रोग कम होने या दर्द कम होने के बाद चायना औषधि का सेवन तब तक करना चाहिए जब तक तेज दर्द कम होकर बंद न हो जाए।
5. कोलेस्टरीन :- यदि पित्त पथरी रोग से पीड़ित रोगी को तेज दर्द हो तो कोलेस्टरीन औषधि की 2X मात्रा या 3 शक्ति के विचूर्ण का प्रयोग करना चाहिए। इस औषधि के प्रयोग से पित्त पथरी के तेज दर्द में तुरंत लाभ मिलता है।
6. जैतून का तेल :- पित्त पथरी होने पर 2 से 3 दिनों तक जैतून का तेल सेवन करना चाहिए। जैतून का तेल सेवन करने के तुरंत बाद रोगी को नींबू का रस पिलाना चाहिए। इसके बाद 3-4 मिनट बाद फिर थोड़ा सा तेल पिलाकर उसके ऊपर नींबू का रस पिलाएं। इस तरह जैतून का तेल पिलाने के बाद नींबू का रस पिलाने से उल्टी नहीं आती। इस तरह जैतून का तेल पीने से 2 से 3 दिनों में पथरी समाप्त हो जाती है।
पित्त पथरी के दर्द के लिए औषधियां :-
पित्त पथरी के रोग में दर्द को दूर करने के लिए प्रयोग की जाने वाली औषधियां :- चियोनैथस- मदर टिंचर और हाइड्रैस्टिस- मदर टिंचर औषधि का प्रयोग 1 से 10 बूंद की मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। चेलिडोनियम- 2X, जेलसिमियम- 1X, बेलाडोना- 3X और आर्सेनिक- 3X से 30 शक्ति,डिजिटेलिस- 30, लारोसिरेसस- 3 आदि।
पित्त पथरी के दर्द को दूर करने के लिए कोलेस्टेरिनम औषधि की 2 शक्ति का भी प्रयोग किया जाता है। इस औषधि की निम्न या क्रमिक शक्ति न होने पर उच्च शक्ति का भी उपयोग किया जा सकता है। रोग के विभिन्न अवस्थाओं में इस औषधि की 3X मात्रा से 3 शक्ति का विचूर्ण प्रयोग करना लाभकारी होता है।
पित्त पथरी होने पर ऐकोनाइट, नक्स-वोमिका, मर्क, चायना, फास्फो आदि बीच-बीच में दी जा सकती है। चायना, ऐकोनाइट एवं मर्क औषधि का प्रयोग मैलेरिया के बुखार के साथ उत्पन्न पित्त पथरी के रोग में किया जा सकता है।
औषधियों से उपचार करने के साथ कुछ परहेज :-
1. पित्त पथरी होने पर रोगी को हल्की एवं आसानी से हजम होने वाले चीजों का सेवन करना चाहिए।
2. पावरोटी को आग में सेंककर, खूब गर्म पानी में डूबोकर चीनी के साथ खाना चाहिए।
3. रोगी को भूना हुआ सेब खाना चाहिए, इच्छापूर्ण ठंडा पानी पीना चाहिए, रोज खुली हवा में घूमना चाहिए।
4. दर्द से बहुत बेचैन हो जाने पर रोगी को गर्म पानी पिलाए, गर्म पानी के टब में बैठाकर आंतों के यंत्रों के ऊपर बूंद-बूंदकर गर्म जल की धारा देना चाहिए और रोगी के कोख में गर्म पुल्टिस लगाना चाहिए। इससे दर्द में आराम मिलता है। इस तरह के उपायों से दर्द में कमी आ जाने पर और पथरी निकल जाने के बाद दुबारा पथरी न हो इसका उपचार करना चाहिए।
5. इस रोग में रोगी को अपने खान-पान को नियमित करना चाहिए। अपने कार्य को नियमित बनाकर रखना चाहिए।
6. रोगी को शारीरिक कार्य करना चाहिए, स्वच्छ हवा में टहलना चाहिए एवं पानी बहुत अधिक मात्रा में पीना चाहिए। इस तरह नियमों का पालन करने और औषधियों का सेवन करने से पथरी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती है। रोगी के लिए गर्म झरने का पानी पीना अत्यंत उपयोगी होता है।
पित्त पथरी को पुन: होने से रोकने के लिए औषधि से उपचार :-
पित्त पथरी को रोकने के लिए चायना- मदर टिंचर औषधि का प्रयोग करना चाहिए। दुबारा पथरी न हो इसके लिए चायना औषधि की 6X मात्रा या इसकी 6 गोलियां प्रतिदिन 2 बार लेनी चाहिए। इस तरह चायना औषधि का प्रयोग 10 दिनों तक करने के बाद एक दिन छोड़ कर दूसरे दिन इसकी गोलियां लेनी चाहिए। इस तरह 20 दिनों तक औषधि का सेवन करें। इसके बाद 3 दिनों में एक बार औषधि का सेवन करें और फिर चार दिनों के अंतर पर औषधि लें और फिर पांच दिनों के अंतर देकर औषधि लें। इस तरह 10-10 दिनों में एक-एक दिन को छोड़ कर तब तक औषधि लेते रहें जब तक औषधि एक महीने के अंतर पर न आ जाए। एक-एक महीने के अंतर पर औषधि 10 बार लें। इस तरह औषधि का सेवन से पथरी बनने की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और फिर दुबारा यह रोग कभी नहीं होता है।
सावधानी :-
पित्त पथरी के रोगी को अधिक चीनी, चर्बी, ‘वेतसार और चूना युक्त चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा मांस, मछली, तेल की बनी हुई चीजें और सोडा औषधि का सेवन करना भी पित्त पथरी वाले के लिए हानिकारक होता है।
Tuesday, December 10, 2019
विटामिन एच Vitamin 'H' Introduction & Sources
परिचय-
विटामिन एच को बायोटिन भी कहा जाता है। यह भी विटामिन बी-काम्लेक्स परिवार का ही एक सदस्य है। इसकी कमी से शरीर में रक्ताल्पता (खून की कमी), और रक्त में लाल कणों का अभाव पैदा हो जाता है। त्वचा पर इसका प्रभाव दिखाई देने लगता है। इसके न रहने पर त्वचा पीली या सफेद सी नजर आने लगती है। इसके न रहने पर सीरम कोलेस्ट्रोल की वृद्धि हो जाती है। विटामिन एच के प्रयोग से जल्दी ही इसकी कमी से होने वाले समस्त विकारों से छुटकारा मिल जाता है। शरीर में रक्ताल्पता (खून की कमी) तो मात्र 6-8 दिन के प्रयोग से ही समाप्त होती देखी गई है। रक्ताल्पता (खून की कमी) दूर होते ही त्वचा पर उभरी सफेदी अथवा पीलापन खुद ही दूर हो जाता है और रोगी अपने अन्दर नई ताजगी स्फूर्ति अनुभव करने लगता है। सीरम कोलेस्ट्रॉल की वृद्धि भी इसके कुछ दिनों के प्रयोग से संतुलित हो जाती है। अत: विटामिन बी-काम्पलेक्स का यह सदस्य अन्य विटामिनों की भांति महत्व ही नहीं रखता बल्कि जीवन शक्ति भी देता है।
एडेनिलिक एसिड-
एडेनिलिक एसिड भी विटामिन बी-काम्पलेक्स परिवार का विशेष सदस्य है। यह यीस्ट में पाया जाता है। पेलाग्रा रोग तथा श्लेष्मकला के जख्म आदि में इसका प्रयोग करने से अतिशय गुणकारी प्रभाव पैदा होता है। इसके प्रभाव से विष लक्षण होना भी संभावित है अत: इसका प्रयोग पूर्ण सावधानी और सतर्कता से करना चाहिए।
कोलीन-coline
कोलीन भी विटामिन बी-काम्पलेक्स परिवार का सदस्य है। यकृत रोगों पर इसका प्रभाव होता है विशेष करके जब यकृत में चर्बी जमा हो जाती है। शरीर में इसकी उपस्थिति से यकृत सम्बंधी रोगों पर रोक लग जाती है अर्थात् यकृत विकार नहीं हो पाते हैं।
फोलिक एसिड-
फोलिक एसिड विटामिन बी-काम्पलेक्स का ही एक शक्तिशाली सदस्य है जो मैक्रोसाइटिक एनीमिया में सफलतापूर्वक प्रयोग की जा रही है। यह पशुओं के यकृत, सोयाबीन, हरी साग, सब्जियां, सूखे मटर, दालें, पालक, चौलाई आदि में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। फोलिक एसिड को आयरन के साथ देने से अधिक शक्तिशाली प्रभाव पैदा होता है। यह कृत्रिम विधियों से बनाया जाता है। प्रारंभ में इसको पालक की हरी पत्तियों में पाया गया था। पालक इसका प्रमुख स्रोत है। इसकी टिकिया तथा इंजेक्शन दोनों उपलब्ध हैं। संग्रहणी, स्प्रू, पुराने दस्तों के बाद होने वाली खतरनाक रक्ताल्पता (खून की कमी) के लिए फोलिक एसिड का प्रयोग रामबाण सिद्ध होता है। गर्भावस्था में होने वाली खून की कमी के लिए इसका प्रयोग करना लाभकारी रहता है। वैसे गर्भावस्था में फोलिक एसिड प्रारंभ से ही देना शुरू कर देना चाहिए। इसको अकेले, आयरन के साथ अथवा लीवर एक्सट्रैक्ट के साथ देना चाहिए। इन दोनों के साथ यह और भी अधिक शक्ति संपन्न हो जाता है। फोलिक एसिड नारंगी रंग का दानेदार फीका पाउडर होता है। स्वस्थ शरीर में इसकी सामान्य मात्रा 5 से 20 मिलीग्राम तथा रोगावस्था में 100 से 150 मिलीग्राम तक होती है।
Monday, December 9, 2019
बालों का सफेद हो जाना (Gray Hair) Homeopathic medicines
बालों का सफेद हो जाना (Gray Hair)
बालों के सफेद हो जाने के रोग में विभिन्न औषधियों का प्रयोग-
1. थाइरायडीन- बुढ़ापे के कारण बालों के सफेद हो जाने के रोग में रोगी को शुरुआती कुछ दिनों तक थाइरॉयडीनऔषधि की 30 शक्ति और फिर उसके बाद 200 शक्ति तक सप्ताह में एक बार लगभग 6-7 सप्ताह तक देने से लाभ होता है।
2. लाइकोपोडियम तथा ऐसिड फॉस- अगर किसी व्यक्ति के बाल कम उम्र में ही सफेद हो जाते हो तो उस व्यक्ति को पहले लाइकोपोडियम औषधि और फिर ऐसिड फॉस औषधि देनी चाहिए। अगर लगातार 3 महीने तक रोगी को किसी भी प्रकार का फायदा न हो तो इन दोनों औषधियों को पहले की ही तरह पहले लाइकोपोडियम और उसके 15 दिन के बाद ऐसिड फॉस देने से लाभ मिलता है।
3. नैट्रम-म्योर- अगर किसी व्यक्ति में लंबे समय से चले आ रहे किसी रोग के कारण बाल कम उम्र में ही सफेद हो जाते हैं तो उसे नैट्रम-म्योर औषधिकी 30 शक्ति का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
4. पाइलोकारपस- अगर बालों की सफेदी दूर करने के लिए अच्छी से अच्छी औषधि से भी लाभ न मिले तो महीने में एक बार पाइलाकोरपस औषधि की 1m की एक मात्रा लगातार कुछ महीने तक देने से लाभ मिलता है।
आधासीसी दर्द, Migraine or Sick-Headache introduction, reason, precautions and Homeopathic treatment.
आधासीसी दर्द (Migraine or Sick-Headache)
Introduction.
परिचय- यह एक प्रकार का सिरदर्द होता है जिसके कारण सिर के आधे भाग में दर्द होता रहता है और इस दर्द का सम्बंध जिगर से होता है इसलिए इसका अंत प्राय: जी मिचलाने तथा उल्टी आने से होता है। दर्द का असर सिर की गुद्दी से या माथे से शुरू होता है और सिर के एक तरफ इसका असर होता है। जब यह दर्द किसी को होता है तो उसे बड़ा तेज सिर में दर्द होता है जो कभी-कभी असहनीय हो जाता है। सिर को छूने से दर्द होता है लेकिन सिर को दबाने से आराम मिलता है। इस रोग से पीड़ित रोगी रोशनी या शोर को बर्दाश्त नही कर पाता है और अंधेरे कमरे में पड़ा रहना चाहता है। इस दर्द का असर कुछ घंटे या दो एक दिन तक रहता है। आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है। यह रोग स्त्रियों को अधिक होता है और उनकी मासिकधर्म के शुरू के समय में यह रोग उन्हें अधिक होता है। इस रोग में उल्टी भी आती है क्योंकि प्रकृति शरीर के पित्त आदि विकारों को बाहर निकाल फेंकना चाहती है। यह रोग पन्द्रह दिन में एक बार या डेढ़ महीने में एक बार या फिर तीन महीने पर एक बार हो सकता है। जब यह रोग होता है तो रोगी के सिर में थोड़ा-थोड़ा दर्द शुरू हो जाता है और वह बेचैन हो जाता है और उसकी तबीयत बहुत अधिक खराब हो जाती है।
यह रोग की अवस्था में पाकाशय (मालाशय) या अनुभावक स्नायुओं की गड़बड़ी के साथ माथे के आधे भाग में दर्द होता है। यह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को अधिक होता है। जिस वंश में यह रोग ज्यादा होता है उनके आने वाले वंशों में भी यह रोग अधिकतर होता है।
Reasons.
आधे सिर में दर्द होने के निम्नलिखित कारण होते हैं-
अधिक तनाव युक्त कार्य करने या मानसिक परिश्रम अधिक करने से यह रोग हो सकता है।
चॉकलेट, पनीर, लाल शराब आदि उत्तेजक पदार्थों का सेवन करने के कारण से भी आधे सिर का दर्द होता है।
स्त्रियों में यह रोग अधिकतर मासिकधर्म में रुकावट आने के कारण होता है।
अधिक उपवास या व्रत रखने के कारण से यह रोग उत्पन्न होता है।
गर्भनिरोधक गोलियों का अधिक मात्रा में सेवन करने से आधे सिर में दर्द हो सकता है।
Homeopathic Medicines.
विभिन्न औषधियों से चिकित्सा-
1. चियोनैनथस- यह वैसे तो जिगर के रोग को ठीक करने की प्रमुख औषधि है। इस औषधि से उपचार करने के लिए इसके मूल-अर्क या पहली शक्ति की दो से चार मात्राएं कई सप्ताह तक लगातार सेवन करना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी के सिर में दर्द हल्का हो और इसका असर आंखों के ऊपर हो तथा आंखों के गोलकों में तेज दर्द हो, नाक की जड़ में भारीपन हो, झुकने से दर्द बढ़ रहा हो, हाथ-पैर चलाने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो रही हो और दर्द हो तो उपचार करने के लिए इस औषधि का उपयोग करना लाभदायक है। स्त्री को मासिकधर्म शुरू होने पर सिर में दर्द हो या पित्त से सम्बंधित लक्षण होने के साथ ही सिर के आधे भाग में दर्द हो रहा हो तो चियोनैनथस औषधि का उपयोग करना बहुत अधिक लाभदायक है।
2. सैंग्वनेरिया- यदि रोगी के सिर में दर्द दांयीं तरफ के भाग में अधिक हो रहा हो और सूर्य के गर्मी के कारण रोग के लक्षणों में वृद्धि हो रही हो तो उपचार करने के लिए सैंग्वनेरिया औषधि के मूल-अर्क की कुछ बून्दों का उपयोग करना चाहिए। रोगी के सिर के आधे भाग में एक निश्चित समय पर दर्द हो रहा हो तो उसका उपचार करने के लिए सैंग्वनेरिया औषधि के मूल-अर्क, 3 शक्ति का उपयोग कर सकते हैं। सिर की गुद्दी में दर्द शुरू हो गया हो और इसका असर ऊपर की ओर चढ़ता हुआ महसूस हो रहा हो, दांयीं आंख के ऊपर इसका दर्द आकर रुक गया हो तो इस प्रकार के लक्षण को भी ठीक करने में सैंग्वनेरिया औषधि उपयोगी है। आधे सिर के दर्द को ठीक करने के लिए सैंग्वनेरिया औषधि की 3X मात्रा या 200 शक्ति का भी प्रयोग कर सकते हैं।स्त्रियों के मासिकधर्म रुक जाने के समय के बाद सातवें दिन में आधे सिर में दर्द हो रहा हो तो सैंग्वनेरिया औषधि से उपचार करना अधिक लाभदायक होता है।
3. कैलि बाईक्रोम- रोगी के सिर के एक भाग की तरफ दर्द होता है और सिर में छोटी-छोटी जगहों पर इस दर्द का असर रहता है। इस प्रकार का दर्द सिर में जुकाम के दब जाने के कारण होता है। माथे में तथा आंखों के ऊपर सिर दर्द का असर होता है, भोंहों के ऊपर भी दर्द होता है जिसका कारण रेशे जम जाना है। सिर दर्द होने से पहले आंखें चुंधियाती है। ऐसे रोगी के रोग की चिकित्सा करने के लिए कैलि बाईक्रोम औषधि की 3 या 30 शक्ति का प्रयोग करने से अधिक लाभ मिल सकता है।
4. नैट्रम म्यूर- रोगी के सिर के आधे भाग में ऐसा दर्द होता है कि सिर आधा हो जाएगा। सुबह के समय में उठने पर ऐसा सिर दर्द होता है कि मानो दिमाग पर हजारों छोटे-छोटे हथौड़ों से चोट मारी जा रही हो, स्त्री रोगी को मासिकधर्म होने के बाद सिर में ऐसा दर्द होता है, सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्द का असर रहता है। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए नैट्रम म्यूर औषधि की 12 या 30 शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है। छोटी कन्याओं जो अधिक कमजोर हो तथा शरीर में खून बहुत कम हो, ऐसे बच्चें जब स्कूल से पढ़ कर आती हैं तो सिर दर्द होता है या उनका यह रोग पुराना हो, सिर के एक तरफ दर्द होता हो, इसके साथ ही जी मिचलाने लगता हो, उल्टी भी आती हो, निश्चित समय पर सिर दर्द हो रहा हो तो ऐसे रोगियों के रोग की चिकित्सा करने के लिए नैट्रम म्यूर औषधि का उपयोग करना लाभदायक है। सिर के सामने के भाग में साइनस में सूजन हो गया हो और सिर में दर्द हो तो उपचार करने के लिए नैट्रम म्यूर औषधि का सेवन करना चाहिए।
5. नैट्रम सल्फ- नैट्रम सल्फ औषधि जिगर के रोग को ठीक करने में बहुत लाभकारी है। यदि रोगी के आधे सिर में दर्द बरसाती मौसम में, सीलन से, पानी के आस-पास होने वाली सब्जियां खाने से, मछली खाने से हो गई हो और इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- सिर दर्द गुद्दी में हो रहा हो और सिर के आधे भाग में दर्द हो रहा हो तो नैट्रम सल्फ औषधि की 12X मात्रा का प्रयोग करने से रोग ठीक हो सकता है। यदि आधे सिर में दर्द हर बसंत ऋतु के आने के साथ ही त्वचा के रोग हो जाने या सीलन वाली जगह पर रहने कारण से हो और तथा कनपटी में कुरेदने जैसा दर्द हो रहा हो तो रोग को ठीक करने के लिए नैट्रम सल्फ औषधि का प्रयोग करना अधिक लाभदायक है।
6. ओनोस्मोडियम- रोगी जब सुबह के समय में उठता है तो उसके गुद्दी तथा माथे पर दर्द होता है और दर्द खासकर सिर के बांयीं तरफ होता है, कनपटियों तथा कान के पीछे के हड्डी में दर्द होता है, आंखों पर भारीपन महसूस हो रहा हो या शरीर में कमजोरी आने के कारण सिर दर्द हो तो ओनोस्मोडियम औषधि की 30 शक्ति का सेवन करने से लाभ मिलता है। रोगी में इस प्रकार के लक्षण भी होते हैं- अधिक कमजोरी आ जाती है, स्त्रियों में संभोग करने की शक्ति नहीं रहती हैं।
7. सोरिनम- आधे सिर में दर्द से पीड़ित रोगी जब रात को सोते-सोते उठ बैठता है मानो किसी ने सिर पर चोट दे मारी हो तो ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए सोरिनम औषधि की 200 शक्ति की मात्रा का उपयोग लाभकारी है।यदि रोगी का यह रोग बहुत पुराना है और इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- सिर-दर्द के होने से रोगी को भूख लगती हो, ऐसा महसूस होता हो कि हथौड़े के लगने जैसा दर्द हो रहा है, रोगी शीत-प्रधान हो, गर्मी में भी गर्म कपड़े लपेटे रहता हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का उपयोग फायदेमंद है।
8. साइलीशिया- सिर की गुद्दी से दर्द शुरू होना, दर्द का असर सिर पर फैलना, आंखों के ऊपर दर्द का असर होना। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी जब सिर पर गर्म कपड़े लपेट लेता है तो उसे आराम मिलता है। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए साइलीशिया औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी है। इस औषधि का प्रयोग करते समय रोगी में इस प्रकार के लक्षणों को भी ध्यान में रखना चाहिए जैसे- रोग के लक्षण समय-समय पर लौट आना, सिर दर्द होना, अकड़न होना, गला पकना, मिर्गी के दौरे पड़ना, फोड़े-फुंसी होना आदि। इस प्रकार के लक्षण रोगी में समय-समय पर ठीक होकर दूबारा से होते रहते हैं। रोगी शीत-प्रधान होता है, आग के पास बैठने का मन करता है, गर्म कपड़े लपेटने का मन करता है, हवा के झोके बर्दास्त नहीं होता है, हाथ-पैर ठण्डे रहते हैं, सर्दियों में रोग का प्रभाव बढ़ जाता है।
9. थूजा- आधे सिर में दर्द की चिकित्सा करने के लिए थूजा औषधि की 6 या 200 शक्ति की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
10. सैलिसिलेट आफ सोडा- आधे सिर के दर्द से पीड़ित रोगी के रोग की चिकित्सा करने के लिए सैलिसिलेट आफ सोडा औषधि की 20 या 30 ग्रेन प्रयोग करना चाहिए।
11. रोबिना- रोगी के पेट में अम्ल पदार्थ ज्यादा होने से सिर में दर्द हो रहा हो और सिर दर्द के साथ अम्लीय पदार्थ की उल्टी हो रही हो, सिर के सामने के भाग में हल्का-हल्का दर्द हो, पढ़ने-लिखने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो, दर्द ऐसा होता है जैसे टनक मारने वाला हो। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए रोबिना औषधि की 3 शक्ति से उपचार करना लाभकारी होता है। यदि आधे सिर में दर्द होने का कारण पेट में अम्लीय पदार्थ है तो इस औषधि से उपचार करना अति लाभदायक है, ऐसे रोगी को खट्टी डंकारे आती हैं, उम्लीय तथा चुभने वाली उल्टी आ जाती है, ऐसे लक्षण हो तो रोग को ठीक करने के लिए रोबिना औषधि का उपयोग करना चाहिए। इस औषधि का सेवन देर तक करना पड़ सकता है।
12. सल्फर- आधे सिर दर्द से पीड़ित रोगी के सिर में एक निश्चित समय पर दर्द हो रहा हो और बार-बार दर्द हो रहा हो, कनपटियों में भारीपन महसूस हो रही हो, ऐसा लग हो रहा हो कि सिर पर भारी बोझ रखा हुआ हो, सिर में दबाव महसूस हो रहा हो तो चिकित्सा करने के लिए सल्फर औषधि की 30 शक्ति की मात्रा का प्रयोग किया जा सकता है।
13. प्रुनस-स्पाइनोसा- आधे सिर के दर्द को ठीक करने के लिए प्रुनस-स्पाइनोसा औषधि की 3 या 6 शक्ति की मात्रा का सेवन करना अधिक लाभकारी होता है। आधे सिर के दर्द को ठीक करने के लिए इन औषधियों का भी उपयोग कर सकते हैं जैसे- विरेट्रम-विर औषधि की 3X मात्रा, इपिकाक औषधि की 30 शक्ति, ड्यूबोइसिन औषधि की 3X मात्रा, एट्रोपिन औषधि की 3X मात्रा या 30 शक्ति, स्ट्रिकनिया औषधि की 30 शक्ति, केनाबिस-इण्डिका औषधि की 3X मात्रा, या हायोसियामिन-हाइड्रोब्रोमेटम की 6X मात्रा चूर्ण आदि।
अन्य चिकित्सा :- other treatments and precautions.
आधे सिर में दर्द से पीड़ित रोगी को घर में बत्ती बुझाकर सोना चाहिए
रोगी को पतली तरल पदार्थ वाली चीजों का सेवन करना चाहिए।
रोगी के सिर के दर्द से कुछ आराम देने के लिए उसके सिर पर गर्म पानी की पट्टी लगानी चाहिए या फिर सरसों की गर्म पोल्टीस गर्दन के नीचे और पीठ पर लगानी चाहिए।
आधे सिर में दर्द से पीड़ित रोगी को दर्द से राहत पाने के लिए कभी भी अफीम मिली दवाईयों या जुलाव आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे हानि होती है।
इस रोग से बचने के लिए सबसे पहले तनाव से बचना चाहिए तथा मानसिक चिंता-फिक्र भी नहीं करना चाहिए।
Introduction.
परिचय- यह एक प्रकार का सिरदर्द होता है जिसके कारण सिर के आधे भाग में दर्द होता रहता है और इस दर्द का सम्बंध जिगर से होता है इसलिए इसका अंत प्राय: जी मिचलाने तथा उल्टी आने से होता है। दर्द का असर सिर की गुद्दी से या माथे से शुरू होता है और सिर के एक तरफ इसका असर होता है। जब यह दर्द किसी को होता है तो उसे बड़ा तेज सिर में दर्द होता है जो कभी-कभी असहनीय हो जाता है। सिर को छूने से दर्द होता है लेकिन सिर को दबाने से आराम मिलता है। इस रोग से पीड़ित रोगी रोशनी या शोर को बर्दाश्त नही कर पाता है और अंधेरे कमरे में पड़ा रहना चाहता है। इस दर्द का असर कुछ घंटे या दो एक दिन तक रहता है। आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है। यह रोग स्त्रियों को अधिक होता है और उनकी मासिकधर्म के शुरू के समय में यह रोग उन्हें अधिक होता है। इस रोग में उल्टी भी आती है क्योंकि प्रकृति शरीर के पित्त आदि विकारों को बाहर निकाल फेंकना चाहती है। यह रोग पन्द्रह दिन में एक बार या डेढ़ महीने में एक बार या फिर तीन महीने पर एक बार हो सकता है। जब यह रोग होता है तो रोगी के सिर में थोड़ा-थोड़ा दर्द शुरू हो जाता है और वह बेचैन हो जाता है और उसकी तबीयत बहुत अधिक खराब हो जाती है।
यह रोग की अवस्था में पाकाशय (मालाशय) या अनुभावक स्नायुओं की गड़बड़ी के साथ माथे के आधे भाग में दर्द होता है। यह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को अधिक होता है। जिस वंश में यह रोग ज्यादा होता है उनके आने वाले वंशों में भी यह रोग अधिकतर होता है।
Reasons.
आधे सिर में दर्द होने के निम्नलिखित कारण होते हैं-
अधिक तनाव युक्त कार्य करने या मानसिक परिश्रम अधिक करने से यह रोग हो सकता है।
चॉकलेट, पनीर, लाल शराब आदि उत्तेजक पदार्थों का सेवन करने के कारण से भी आधे सिर का दर्द होता है।
स्त्रियों में यह रोग अधिकतर मासिकधर्म में रुकावट आने के कारण होता है।
अधिक उपवास या व्रत रखने के कारण से यह रोग उत्पन्न होता है।
गर्भनिरोधक गोलियों का अधिक मात्रा में सेवन करने से आधे सिर में दर्द हो सकता है।
Homeopathic Medicines.
विभिन्न औषधियों से चिकित्सा-
1. चियोनैनथस- यह वैसे तो जिगर के रोग को ठीक करने की प्रमुख औषधि है। इस औषधि से उपचार करने के लिए इसके मूल-अर्क या पहली शक्ति की दो से चार मात्राएं कई सप्ताह तक लगातार सेवन करना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी के सिर में दर्द हल्का हो और इसका असर आंखों के ऊपर हो तथा आंखों के गोलकों में तेज दर्द हो, नाक की जड़ में भारीपन हो, झुकने से दर्द बढ़ रहा हो, हाथ-पैर चलाने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो रही हो और दर्द हो तो उपचार करने के लिए इस औषधि का उपयोग करना लाभदायक है। स्त्री को मासिकधर्म शुरू होने पर सिर में दर्द हो या पित्त से सम्बंधित लक्षण होने के साथ ही सिर के आधे भाग में दर्द हो रहा हो तो चियोनैनथस औषधि का उपयोग करना बहुत अधिक लाभदायक है।
2. सैंग्वनेरिया- यदि रोगी के सिर में दर्द दांयीं तरफ के भाग में अधिक हो रहा हो और सूर्य के गर्मी के कारण रोग के लक्षणों में वृद्धि हो रही हो तो उपचार करने के लिए सैंग्वनेरिया औषधि के मूल-अर्क की कुछ बून्दों का उपयोग करना चाहिए। रोगी के सिर के आधे भाग में एक निश्चित समय पर दर्द हो रहा हो तो उसका उपचार करने के लिए सैंग्वनेरिया औषधि के मूल-अर्क, 3 शक्ति का उपयोग कर सकते हैं। सिर की गुद्दी में दर्द शुरू हो गया हो और इसका असर ऊपर की ओर चढ़ता हुआ महसूस हो रहा हो, दांयीं आंख के ऊपर इसका दर्द आकर रुक गया हो तो इस प्रकार के लक्षण को भी ठीक करने में सैंग्वनेरिया औषधि उपयोगी है। आधे सिर के दर्द को ठीक करने के लिए सैंग्वनेरिया औषधि की 3X मात्रा या 200 शक्ति का भी प्रयोग कर सकते हैं।स्त्रियों के मासिकधर्म रुक जाने के समय के बाद सातवें दिन में आधे सिर में दर्द हो रहा हो तो सैंग्वनेरिया औषधि से उपचार करना अधिक लाभदायक होता है।
3. कैलि बाईक्रोम- रोगी के सिर के एक भाग की तरफ दर्द होता है और सिर में छोटी-छोटी जगहों पर इस दर्द का असर रहता है। इस प्रकार का दर्द सिर में जुकाम के दब जाने के कारण होता है। माथे में तथा आंखों के ऊपर सिर दर्द का असर होता है, भोंहों के ऊपर भी दर्द होता है जिसका कारण रेशे जम जाना है। सिर दर्द होने से पहले आंखें चुंधियाती है। ऐसे रोगी के रोग की चिकित्सा करने के लिए कैलि बाईक्रोम औषधि की 3 या 30 शक्ति का प्रयोग करने से अधिक लाभ मिल सकता है।
4. नैट्रम म्यूर- रोगी के सिर के आधे भाग में ऐसा दर्द होता है कि सिर आधा हो जाएगा। सुबह के समय में उठने पर ऐसा सिर दर्द होता है कि मानो दिमाग पर हजारों छोटे-छोटे हथौड़ों से चोट मारी जा रही हो, स्त्री रोगी को मासिकधर्म होने के बाद सिर में ऐसा दर्द होता है, सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्द का असर रहता है। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए नैट्रम म्यूर औषधि की 12 या 30 शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है। छोटी कन्याओं जो अधिक कमजोर हो तथा शरीर में खून बहुत कम हो, ऐसे बच्चें जब स्कूल से पढ़ कर आती हैं तो सिर दर्द होता है या उनका यह रोग पुराना हो, सिर के एक तरफ दर्द होता हो, इसके साथ ही जी मिचलाने लगता हो, उल्टी भी आती हो, निश्चित समय पर सिर दर्द हो रहा हो तो ऐसे रोगियों के रोग की चिकित्सा करने के लिए नैट्रम म्यूर औषधि का उपयोग करना लाभदायक है। सिर के सामने के भाग में साइनस में सूजन हो गया हो और सिर में दर्द हो तो उपचार करने के लिए नैट्रम म्यूर औषधि का सेवन करना चाहिए।
5. नैट्रम सल्फ- नैट्रम सल्फ औषधि जिगर के रोग को ठीक करने में बहुत लाभकारी है। यदि रोगी के आधे सिर में दर्द बरसाती मौसम में, सीलन से, पानी के आस-पास होने वाली सब्जियां खाने से, मछली खाने से हो गई हो और इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- सिर दर्द गुद्दी में हो रहा हो और सिर के आधे भाग में दर्द हो रहा हो तो नैट्रम सल्फ औषधि की 12X मात्रा का प्रयोग करने से रोग ठीक हो सकता है। यदि आधे सिर में दर्द हर बसंत ऋतु के आने के साथ ही त्वचा के रोग हो जाने या सीलन वाली जगह पर रहने कारण से हो और तथा कनपटी में कुरेदने जैसा दर्द हो रहा हो तो रोग को ठीक करने के लिए नैट्रम सल्फ औषधि का प्रयोग करना अधिक लाभदायक है।
6. ओनोस्मोडियम- रोगी जब सुबह के समय में उठता है तो उसके गुद्दी तथा माथे पर दर्द होता है और दर्द खासकर सिर के बांयीं तरफ होता है, कनपटियों तथा कान के पीछे के हड्डी में दर्द होता है, आंखों पर भारीपन महसूस हो रहा हो या शरीर में कमजोरी आने के कारण सिर दर्द हो तो ओनोस्मोडियम औषधि की 30 शक्ति का सेवन करने से लाभ मिलता है। रोगी में इस प्रकार के लक्षण भी होते हैं- अधिक कमजोरी आ जाती है, स्त्रियों में संभोग करने की शक्ति नहीं रहती हैं।
7. सोरिनम- आधे सिर में दर्द से पीड़ित रोगी जब रात को सोते-सोते उठ बैठता है मानो किसी ने सिर पर चोट दे मारी हो तो ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए सोरिनम औषधि की 200 शक्ति की मात्रा का उपयोग लाभकारी है।यदि रोगी का यह रोग बहुत पुराना है और इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- सिर-दर्द के होने से रोगी को भूख लगती हो, ऐसा महसूस होता हो कि हथौड़े के लगने जैसा दर्द हो रहा है, रोगी शीत-प्रधान हो, गर्मी में भी गर्म कपड़े लपेटे रहता हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का उपयोग फायदेमंद है।
8. साइलीशिया- सिर की गुद्दी से दर्द शुरू होना, दर्द का असर सिर पर फैलना, आंखों के ऊपर दर्द का असर होना। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी जब सिर पर गर्म कपड़े लपेट लेता है तो उसे आराम मिलता है। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए साइलीशिया औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी है। इस औषधि का प्रयोग करते समय रोगी में इस प्रकार के लक्षणों को भी ध्यान में रखना चाहिए जैसे- रोग के लक्षण समय-समय पर लौट आना, सिर दर्द होना, अकड़न होना, गला पकना, मिर्गी के दौरे पड़ना, फोड़े-फुंसी होना आदि। इस प्रकार के लक्षण रोगी में समय-समय पर ठीक होकर दूबारा से होते रहते हैं। रोगी शीत-प्रधान होता है, आग के पास बैठने का मन करता है, गर्म कपड़े लपेटने का मन करता है, हवा के झोके बर्दास्त नहीं होता है, हाथ-पैर ठण्डे रहते हैं, सर्दियों में रोग का प्रभाव बढ़ जाता है।
9. थूजा- आधे सिर में दर्द की चिकित्सा करने के लिए थूजा औषधि की 6 या 200 शक्ति की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
10. सैलिसिलेट आफ सोडा- आधे सिर के दर्द से पीड़ित रोगी के रोग की चिकित्सा करने के लिए सैलिसिलेट आफ सोडा औषधि की 20 या 30 ग्रेन प्रयोग करना चाहिए।
11. रोबिना- रोगी के पेट में अम्ल पदार्थ ज्यादा होने से सिर में दर्द हो रहा हो और सिर दर्द के साथ अम्लीय पदार्थ की उल्टी हो रही हो, सिर के सामने के भाग में हल्का-हल्का दर्द हो, पढ़ने-लिखने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो, दर्द ऐसा होता है जैसे टनक मारने वाला हो। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए रोबिना औषधि की 3 शक्ति से उपचार करना लाभकारी होता है। यदि आधे सिर में दर्द होने का कारण पेट में अम्लीय पदार्थ है तो इस औषधि से उपचार करना अति लाभदायक है, ऐसे रोगी को खट्टी डंकारे आती हैं, उम्लीय तथा चुभने वाली उल्टी आ जाती है, ऐसे लक्षण हो तो रोग को ठीक करने के लिए रोबिना औषधि का उपयोग करना चाहिए। इस औषधि का सेवन देर तक करना पड़ सकता है।
12. सल्फर- आधे सिर दर्द से पीड़ित रोगी के सिर में एक निश्चित समय पर दर्द हो रहा हो और बार-बार दर्द हो रहा हो, कनपटियों में भारीपन महसूस हो रही हो, ऐसा लग हो रहा हो कि सिर पर भारी बोझ रखा हुआ हो, सिर में दबाव महसूस हो रहा हो तो चिकित्सा करने के लिए सल्फर औषधि की 30 शक्ति की मात्रा का प्रयोग किया जा सकता है।
13. प्रुनस-स्पाइनोसा- आधे सिर के दर्द को ठीक करने के लिए प्रुनस-स्पाइनोसा औषधि की 3 या 6 शक्ति की मात्रा का सेवन करना अधिक लाभकारी होता है। आधे सिर के दर्द को ठीक करने के लिए इन औषधियों का भी उपयोग कर सकते हैं जैसे- विरेट्रम-विर औषधि की 3X मात्रा, इपिकाक औषधि की 30 शक्ति, ड्यूबोइसिन औषधि की 3X मात्रा, एट्रोपिन औषधि की 3X मात्रा या 30 शक्ति, स्ट्रिकनिया औषधि की 30 शक्ति, केनाबिस-इण्डिका औषधि की 3X मात्रा, या हायोसियामिन-हाइड्रोब्रोमेटम की 6X मात्रा चूर्ण आदि।
अन्य चिकित्सा :- other treatments and precautions.
आधे सिर में दर्द से पीड़ित रोगी को घर में बत्ती बुझाकर सोना चाहिए
रोगी को पतली तरल पदार्थ वाली चीजों का सेवन करना चाहिए।
रोगी के सिर के दर्द से कुछ आराम देने के लिए उसके सिर पर गर्म पानी की पट्टी लगानी चाहिए या फिर सरसों की गर्म पोल्टीस गर्दन के नीचे और पीठ पर लगानी चाहिए।
आधे सिर में दर्द से पीड़ित रोगी को दर्द से राहत पाने के लिए कभी भी अफीम मिली दवाईयों या जुलाव आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे हानि होती है।
इस रोग से बचने के लिए सबसे पहले तनाव से बचना चाहिए तथा मानसिक चिंता-फिक्र भी नहीं करना चाहिए।
Sunday, December 8, 2019
Albuminuria introduction and Homeopathic medicine पेशाब में ऐलब्यूमिना आना
पेशाब में ऐलब्यूमिना आना (Albuminuria)
परिचय :- शरीर में मौजूद दूषित कण को पानी के साथ बाहर निकालने तथा आवश्यक तत्व को शरीर में वापस भेजने का काम गुर्दे करते हैं। जब किसी कारण से गुर्दे में सूजन आ जाती है तो गुर्दे अपने काम को ठीक से नहीं कर पाते हैं जिससे शरीर के आवश्यक तत्व भी पेशाब के द्वारा बाहर निकलने लगते हैं। रोगी में मूत्र-ग्रन्थि की जलन अधिक पुरानी हो जाने पर पेशाब के साथ खून की जलीय अंश निकलने लगता है जिसे अण्डलालयुक्त मूत्र कहते हैं। गुर्दे की सूजन को नेफ्राइटिस या ब्राइट्स कहते हैं। इस रोग से ग्रस्त रोगी में बुखार, प्यास अधिक लगती है, जी मिचलाता है, बार-बार पेशाब करने की इच्छा होती है, पेशाब अधिक मात्रा में आता है तथा अण्डे की तरह सफेदी मिला हुआ पेशाब आता रहता है, हाथ-पैर व चेहरा फूल जाते हैं, शरीर में खून की कमी होने लगती है,सूजन आ जाती है तथा मस्तिष्क या जिगर का रोग उत्पन्न होने लगता है, पेशाब में ऐलब्यूमिना आता है तथा खून मिला हुआ पेशाब आने के साथ शरीर में सूजन आ जाती है।
ऐसी स्थिति में रोगी का उपचार न कराने पर रोग अधिक भयंकर हो जाता है और अन्त में रोगी मर जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए होम्योपैथिक औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस रोग को ठीक करने के लिए मुख्य रूप से एपिस, ऐकोनाइट, कैनेबिस सैटाइवा, कैन्थरिस, आर्सेनिक, सल्फर तथा मर्क-कौर का प्रयोग किया जाता है।
साण्डलाल मूत्र रोग होने का मुख्य कारण बुखार का अधिक आना, शरीर में जलन होना, श्वेतप्रदर रोग,आंतों का रोग अधिक पुराना होना, पाचनतन्त्र खराब होने के कारण खाना हजम न होना, अधिक अण्डलाल मिला हुआ भोजन आना तथा अधिक देर तक ठण्डे पानी से नहाना आदि है।
पेशाब में ऐलब्यूमिना आना के रोग में प्रयोग की जाने वाली औषधियां :-
1. एपिस :- जब किसी रोगी के पेशाब में ऐलब्यूमिना की मात्रा बढ़ जाती है तो रोगी के पूरे शरीर में सूजन आ जाती है विशेषकर चेहरे पर। आंखों की ऊपर पलकें सूज जाती हैं, रोगी को प्यास अधिक लगने लगती है तथा पसीना अधिक आता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को एपिस औषधि की निम्न शक्ति या मूलार्क का सेवन कराना हितकारी होता है।
2. ऐकोनाइट :- पेशाब में ऐलब्यूमिना आने के शुरुआती अवस्था में ही रोगी को ऐकोनाइट औषधि की 3 शक्ति का सेवन कराना लाभकारी होता है।
3. कैनेबिस सैटाइवा :- यदि रोगी के पेशाब में ऐलब्यूमिना आने के लक्षण काफी समय से चला आ रहा है तो उसे कैनेबिस सैटाइवा औषधि की 3 शक्ति या मूलार्क का सेवन कराना चाहिए।
4. कैन्थरिस :- इस रोग से ग्रस्त रोगी में उत्पन्न विभिन्न लक्षण जैसे- पेशाब में जलन होना और खून मिला पेशाब बूंद-बूंद आना। पेशाब करने के बाद मूत्रनली में तेज जलन होना या हल्की चिड़चिड़ाहट होना। कभी-कभी पेशाब में मसाने की झिल्ली के टुकड़े भी आना। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को कैन्थरिस औषधि की 6 या 30 शक्ति का सेवन कराना अधिक लाभकारी होता है।
5. आर्सेनिक :- इस रोग के नए लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करना हितकारी होता है। पेशाब में ऐलब्यूमिना आने के साथ हाथ-पैर व आंखों की पलकों में सूजन आ जाने के बाद सारे शरीर में सूजन आ जाती है। शरीर पर ठण्डा पसीना आता है फिर भी जलन महसूस होती है। बेचैनी, कमजोरी, थोड़ी-थोड़ी देर में तेज प्यास लगती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को आर्सेनिक औषधि की 30 या 200 शक्ति का सेवन कराना चाहिए।
6. सल्फर :- यदि मसाने में पस पड़ गए हो और मसाने कमजोर हो गया हो तो ऐसे लक्षणों में सल्फर औषधि की 30 शक्ति का उपयोग किया जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को लाइकोपोडियम औषधि भी देना उचित होता है।
7. मर्क-कौर :- गर्भावस्था में यदि मसाने की सूजन हो जाने के कारण पेशाब से ऐलब्यूमिना आता हो तो उस स्त्री के लिए मर्क-कौर औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराना हितकारी होता है।
8. कौक का लिम्फ :- पेशाब में ऐलब्यूमिना आने पर रोगी को कौक का लिम्फ औषधि की 6 शक्ति का सेवन कराना हितकारी होता है।
9. ऐकोन :- साण्डलाल रोग होने पर रोग के शुरुआती अवस्था में ऐकोन औषधि की 3x औषधि का सेवन कराना चाहिए।
10. एसिड-फास या हेलोनियम :- इस रोग के साथ यदि रोगी में स्नायविक उत्तेजना रहती हो तो रोगी को एसिड-फास औषधि की 2x या 3 शक्ति या हेलोनियम औषधि की 3x औषधि का प्रयोग करना हितकारी होता है।
11. लाईको-टेरिबिन्थ :- मूत्र-मार्ग रोग ग्रस्त होने के कारण पेशाब में ऐलब्यूमिना आता हो तो रोगी को लाइको 6 या टेरिबिन्थ 3 शक्ति का सेवन कराना लाभकारी होता है।
12. ऐपोसाइनम :- मूत्र-मार्ग में सूजन आ जाने या अन्य रोग होने के कारण पेशाब में ऐलब्यूमिना आता हो तो ऐपोसाइनम- θ औषधि का प्रयोग करें।
13. आर्स :-
- यदि रोगी के पेशाब में ऐलब्यूमिना आता है और उसमें सुस्ती, बेचैनी, घबड़ाहट, अधिक प्यास, शरीर ठण्डा परन्तु अन्दर गर्मी महसूस होना आदि लक्षण दिखाई दे तो उसे 3x या 30 शक्ति का सेवन कराना हितकारी होता है।
- पेशाब के साथ ऐलब्यूमिना आने पर रोग को ठीक करने के लिए प्रयोग की जाने वाली औषधियों के साथ अधिक लाभ के लिए बीच-बीच में एपिस, आर्ज-नाई आरम, कैन्थ, लैके, सल्फ आदि की भी आश्यकता पड़ सकती है।
14. सिर्फ दूध पीना :- पेशाब में ऐलब्यूमिना आने के लक्षणों में रोगी को दूध पीना चाहिए। इससे काफी लाभ मिलता है। नमक का सेवन करना भी इस रोग में लाभकारी होता है। ऊनी कपड़े पहनना, नहाते समय तौलिया से अच्छी तरह शरीर को पोंछना आदि से रोग में लाभ होता है। मांस, मछली तथा उत्तेजक पदार्थ का सेवन हानिकारक होता है।
























































