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Friday, February 7, 2020

Vitamin C Introduction, causes, Symptoms and fruits. विटामिन `सी´ की कमी से होने वाले रोग-

विटामिन `सी´ की कमी से होने वाले रोग-
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विटामिन `सी´ के स्रोत वाले खाद्य पदार्थों की तालिका-

विटामिन `सी´ की महत्वपूर्ण बातें-
  • विदेशों में न्यूमोनिया तथा लाल ज्वर जैसे खतरनाक संक्रमण युक्त रोगों में विटामिन `सी´ रोगी को देना अति आवश्यक समझा जाता है।
  • कनपेड़े अर्थात् मम्पस रोगों में रोगी को विटामिन सी पानी में घोलकर पिलाते रहने से सूजन, वेदना तथा ज्वर धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं।
  • काली खांसी में विटामिन `सी´ लाभ प्रदान करता है।
  • जोड़ों में सूजन होने के दर्द में विटामिन `सी´ लाभप्रद हो जाता है।
  • मोतियाबिन्द के रोगी को विटामिन `सी´ देने से मोतियाबिन्द रुक जाता है।
  • गर्भावस्था में विटामिन `सी´ का प्रयोग करने से सूजन समाप्त हो जाती है।
  • विटामिन `सी´ की कमी से रोगी स्कर्वी रोग का शिकार हो जाता है।

  • विटामिन `सी´ गंधहीन तथा रंगहीन होता है।
  • विटामिन `सी´ रक्त में लाल कणों को बनाने में अति महत्वपूर्ण कार्य करता है।
  • शरीर में विटामिन `सी´ की कमी हो जाने से कोशिकाओं तथा रक्त कोशिकाओं की दीवारें फटने लगती हैं और रोगी कई रोगों के संक्रमण का शिकार हो जाता है।
  • गर्भपात को रोकने के लिए विटामिन `सी´ का महत्वपूर्ण योगदान रहता है।
  • शरीर के किसी भी अंग से रक्तस्राव को रोकने में विटामिन `सी´ सहायता प्रदान करता है।
  • विटामिन `सी´ की कमी से आमाशय में घाव हो जाते हैं।
  • क्षय (टी.बी.) रोग में विटामिन `सी´ का प्रयोग बहुत लाभ करता है।

  • टूटी हड्डी को जोड़ने के लिए ऑप्रेशन के बाद विटामिन `सी´ की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है।
  • फेफड़े का रक्तस्राव विटामिन `सी´ के प्रयोग से रुक जाता है।
  • विटामिन `सी´ की कमी से पायरिया रोग होता है। जो विटामिन `सी´ का प्रयोग करने पर ठीक हो जाता है।
  • यदि थोड़ा काम करते ही रोगी थक जाता है तो यह शरीर में विटामिन `सी´ की कमी का कारण है।
  • सांस के रोग का होना ही साबित करता है कि रोगी के शरीर में लंबे समय से विटामिन `सी´ की कमी होती चली आ रही है।
  • विटामिन `सी´ की कमी से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है।
  • विटामिन `सी´ के प्रयोग से शरीर की रक्तवाहिनियां लचीली हो जाती हैं और उनकी कठोरता समाप्त हो जाती है।

  • विटामिन `सी´ बूढ़ों में भी चुस्ती-फुर्ती और शक्ति का संचार करने में मददगार होती है।
  • विटामिन `सी´ के प्रयोग से हर प्रकार की एलर्जी में लाभ होता है।
  • चलते-चलते थक जाना, दर्द होना, ऐंठन होना शरीर में विटामिन `सी´ की कमी को दर्शाता है।
  • विटामिन `सी´ को पानी में घोलकर पीने से सांप के विष का प्रभाव भी समाप्त हो जाता है।
  • विटामिन `सी´ की कमी से घाव भरने में देरी लगती है।
  • विटामिन `सी´ के प्रयोग से नासूर जैसे खतरनाक घाव भी ठीक होने लगते हैं।
  • आग में जल जाने के बाद तुरन्त ही विटामिन `सी´ का प्रयोग करने से जलन एवं वेदना में धीरे-धीरे आराम होने लगता है।

  • विटामिन `सी´ की टिकिया कारबंकल जैसे भयंकर घावों पर पीसकर भर देने से घाव जल्दी ही ठीक होने लगते हैं।
  • विटामिन `ए´ की भांति विटामिन `सी´ का भी नेत्र रोग के लिए महत्वपूर्ण प्रभाव होता है।
  • विटामिन `सी´ को ही एस्कोर्बिक एसिड कहा जाता है और यह जल में घुलनशील होता है।
  • विटामिन `सी´ को टूटे-फूटे अंगों को जोड़ने के लिए सीमेंट जैसी संज्ञा दी जा सकती है।
  • विटामिन `सी´ की कमी से शरीर में खून की कमी हो जाती है।
  • विटामिन `सी´ खून में लाल कणों की वृद्धि करने में सहायक होता है।
  • अर्टिकेरिया, फीवर, त्वचा के दानों में रोगी को विटामिन `सी´ देने से लाभ होता है।

  • विषैले जन्तुओं के काट लेने पर विटामिन `सी´ से तुरन्त राहत मिलती है तथा जलन और दर्द दूर हो जाते हैं।
  • ज्वर (बुखार) हो तो विटामिन `सी´ का इंजेक्शन देते ही ज्वर उतर जाता है।
  • प्रोस्टेट ग्लैण्ड का संक्रमण विटामिन `सी´ से शान्त हो जाता है।
  • आंख, नाक, कान और गले के रोगों एवं विकारों के लिए विटामिन सी का प्रयोग अतिशय गुणकारी प्रभाव रखता है।
  • विटामिन `सी´ की कमी से हडि्डयों के जोड़ों में से रक्तस्राव होने लगता है। कभी-कभी हडि्डयों के यह अन्तिम छोर अलग ही हो जाते हैं।
  • स्वस्थ शरीर के लिए 25 से 30 मिलीग्राम विटामिन `सी´ पर्याप्त होता है।

  • बच्चों के शरीर में विटामिन `सी´ की पूर्ति करनी हो तो नारंगी, आंवला, मौसमी का रस पिलाना ही पर्याप्त है। आंवला विटामिन `सी´ के लिए सबसे उत्तम होता है। सूखे और ताजे दोनों आंवलों में यह विटामिन समान रूप से विद्यमान रहता है।
  • संधिवातसंधिशोथ तथा आमवात यानी जोड़ों के दर्द में विटामिन `सी´ गुणकारी उत्तम प्रभाव पैदा करता है।
  • यदि शरीर में विटामिन `सी´ की अत्यधिक कमी हो तो शीघ्र लाभ के लिए इंजेक्शन का प्रयोग करना ज्यादा हितकर होता है।
  • एक वर्ष से डेढ़ वर्ष तक के बच्चों को यह विटामिन प्रतिदिन 50 मिलीग्राम तक की मात्रा में देना आवश्यक होता है।
  • विटामिन `सी´ की कमी से त्वचा लटक जाती है तथा चेहरे एवं शरीर पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
  • पक्षाघात तथा पोलियों जैसे रोग शरीर में विटामिन `सी´ की कमी से होते हैं जिन्हें विटामिन `सी´ का प्रयोग करके ठीक किया जा सकता है।
  • चेहरे के खतरनाक दाग-धब्बे विटामिन `सी´ के प्रयोग से ठीक हो जाते हैं।
  • कंजेस्टिट हार्ट फेल्यूर रोग में विटामिन `सी´ का प्रयोग करने से अधिक पेशाब आकर शरीर की सूजन तथा हृदय की तकलीफ सहित अन्य कई विकार नष्ट हो जाते हैं।

Wednesday, February 5, 2020

Vitamin B-Complex Introduction, causes, symptoms and sources

परिचय-
विटामिन बी-काम्पलेक्स शरीर को जीवनी शक्ति देने के लिए अति आवश्यक होता है। इस विटामिन की कमी से शरीर अनेक रोगों का गढ़ बन जाता है। विटामिन-बी के कई विभागों की खोज की जा चुकी है। ये सभी विभाग मिलकर ही विटामिन बी-काम्पलेक्स कहलाते हैं। हालांकि सभी विभाग एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं, लेकिन फिर भी सभी आपस में भिन्नता रखते हैं। 
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विटामिन बी-काम्पलेक्स 120 सेंटीग्रेड तक की गर्मी सहन करने की क्षमता रखता है। उससे अधिक ताप यह सहन नहीं कर पाता और नष्ट हो जाता है। यह विटामिन पानी में घुलनशील है। इसका प्रमुख कार्य स्नायु को स्वस्थ रखना तथा भोजन के पाचन में सक्रिय योगदान देना होता है। भूख को बढ़ाकर यह शरीर को जीवनी शक्ति देता है। ये खाए-पिए हुए पदार्थों को अंग लगाने में सहायता प्रदान करता है। क्षार पदार्थों के संयोग से यह बिना किसी ताप के नष्ट हो जाता है, पर अम्ल के साथ उबाले जाने पर भी नष्ट नहीं होता।

विटामिन-`बी´ काम्पलेक्स की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-
  • हाथ पैरों की उंगलियों में सनसनाहट होना।
  • मस्तिष्क की स्नायु में सूजन व दोष होना।
  • पैर ठण्डे व गीले होना।
  • सिर के पिछले भाग में स्नायु दोष हो जाना ।
  • मांसपेशियों का कमजोर होना ।
  • हाथ-पैरों के जोड़ अकड़ना।
  • शरीर का वजन घट जाना।
  • नींद कम आना।
  • मूत्राशय मसाने में दोष आना ।
  • महामारी की खराबी होना ।
  • शरीर पर लाल-चकत्ते निकलना।
  • दिल कमजोर होना ।
  • शरीर में सूजन आना ।
  • सिर चकराना ।
  • नजर कम हो जाना।
  • पाचन क्रिया की खराबी होना ।

विटामिन बी-काम्पलेक्स के स्रोत खाद्य पदार्थ-

विटामिन बी-काम्पलेक्स के प्रमुख विभाग
1.
विटामिन बी1
थाईमिन हाइड्राक्लोराइट
(नोट-इसे एन्यूरिन तथा बेरी-बेरी विटामिन भी कहा जाता है।)
2
विटामिन बी2
रिबोफ्लेबिन अथवा लैक्टोफ्लेबिन
इसको विटामिन `जी´ भी कहा जाता है।
3
विटामिन बी3
पैन्टोथेनिक एसिड
4
विटामिन बी4
एमाइनो एसिड
5
विटामिन बी6
पायरीडॉक्सीन
6
विटामिन बी7
-
7
विटामिन बी12
-
8
फोलिक एसिड
-
9
यीस्ट
खमीर
10
निकोटनिक एसिड
-
11
नियासिन
-
12
निकोटिनामाइड
-
13
पैरा-एमीनो बेन्जोइएक एसिड
-
14
विटामिन `ए´
बायोटिन
15
एडेनिल्कि एसिड
-
16
कोलीन
-

Thursday, January 9, 2020

विटामिन `डी` की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग- Vitamin D deficiency causes importance, sources, benifit. Desiase

विटामिन `डी` की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-

विटामिन `डीयुक्त खाद्यों की तालिका-
निम्नलिखित खाद्य-पदार्थो में विटामिन `डी´ पाया जाता है। जिन रोगियों के शरीर में विटामिन `डी´ की कमी होती है उनको औषधियों से चिकित्सा करने के साथ-साथ इन खाद्यों का प्रयोग भी करना चाहिए। विटामिन `डी´ प्राय: उन सभी खाद्यों में होता है जिनमें विटामिन `ए´ पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है।


  • ताजी साग-सब्जी।
  • पत्तागोभी
  • पालक का साग।
  • सरसों का साग।
  • हरा पुदीना।
  • हरा धनिया।
  • गाजर
  • चुकन्दर
  • शलजम
  • टमाटर।
  • नारंगी।
  • नींबू
  • मालटा।
  • मूली
  • मूली के पत्ते।
  • काड लिवर ऑयल।
  • हाली बुटलिवर ऑयल सलाद।
  • सलाद।
  • चोकर सहित गेंहूं की रोटी।
  • सूर्य का प्रकाश।
  • नारियल
  • मक्खन।
  • घी
  • दूध
  • केला
  • पपीता
  • शाकाहारी भोजन।
  • मछली का तेल।
  • शार्क लीवर ऑयल।
  • अण्डे की जर्दी।
  • बकरे की अण्डग्रंथियां।

विटामिन `डी´ से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें-
  • विटामिन `डी´ का आविष्कार विड्स ने 1932 में किया था।
  • विटामिन `ए´ की भांति विटामिन `डी´ भी तेल और वसा में घुल जाता है पर पानी में नहीं घुलता।
  • जिन पदार्थो में विटामिन `ए´ रहता है विशेषकर उन्हीं में विटामिन `डी´ भी विद्यमान रहता है।
  • मछली के तेल में विटामिन `डी´ अधिक पाया जाता है।
  • विटामिन `डी´ की कमी हो जाने पर आंतें कैल्शियम तथा फास्फोरस को चूसकर रक्त में शामिल नहीं कर पाती हैं।
  • सूर्य के प्रकाश में विटामिन `डी´ रहता है। कुछ चिकित्सक घावों, फोड़ों तथा रसौलियों की चिकित्सा सूर्य के प्रकाश से करते हैं।

  • प्रातःकाल सूर्य के प्रकाश में लेटकर सरसों के तेल की मालिश पूरे शरीर पर की जाए तो शरीर को विटामिन `डी´ पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है।
  • सौर ऊर्जा से बने भोजन में पर्याप्त मात्रा में विटामिन `डी´ उपलब्ध होता है।
  • भोजन को थोड़ी देर तक सूर्य के प्रकाश में रख दिया जाये तो उसमें विटामिन `डी´ पर्याप्त मात्रा में आ जाता है।
  • चर्म रोगों की चिकित्सा के लिए विटामिन `डी´ अति उपयोगी है। इसलिए कई चर्म रोग सूर्य का प्रकाश दिखाने से ठीक हो जाते हैं। विटामिन डी का सूर्य से उतना ही सम्बंध है जितना शरीर का आत्मा से।
  • विटामिन `डी´ मजबूत चमकीले दांतों के लिए अति आवश्यक है।
  • विटामिन `डी´ हडि्डयों को मजबूत बनाता है।
  • विटामिन `डी´ की कमी से हडि्डयां मुलायम हो जाती हैं।
  • विटामिन `डी´ कमी से त्वचा खुश्क हो जाती है।
  • जो लोग अंधेरे स्थानों में निवास करते हैं वे विटामिन `डी´ कमी के शिकार हो जाते हैं।

  • विटामिन `डी´ की कमी से कूबड़ निकल आता है।
  • विटामिन `डी´ की कमी से पेडू और पीठ की हडि्डयां मुड़ जाती हैं या मुलायम हो जाती है।
  • ठण्डे मुल्कों के लोग विटामिन `डी´ की कमी के शिकार रहते हैं।
  • प्राचीनकाल में लोग खुले वातावरण में रहते थे इसलिए वे बहुत कम रोगों के शिकार होते थे।
  • श्वास रोगों को दूर करने के लिए विटामिन `डी´ बहुत असरकारक साबित होता है।
  • गर्भावस्था में विटामिन `डी´ की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है। यदि गर्भवती स्त्री को विटामिन `डी´ की कमी हो जाये तो पैदा होने वाले बच्चे के दांत कमजोर निकलते हैं और जल्दी ही उनमें कीड़ा लग जाता है।
  • विटामिन `डी´ के कारण दांतों में कीड़ा नहीं लगता।
  • शरीर में विटामिन `डी´ की कमी से हडि्डयों में सूजन आ जाती है।
  • गर्म देश होने के बाद भी भारत के लोगों में सामान्यत: कमजोर अस्थियों का रोग पाया जाता है।
  • केवल अनाज पर निर्भर रहने वाले लोग अक्सर अस्थिमृदुलता (हडि्डयों का कमजोर होना) के शिकार हो जाते हैं।
  • बच्चे की खोपड़ी की हडि्डयां तीन मास के बाद भी नर्म रहे तो समझना चाहिए कि विटामिन `डी´ की अत्यधिक कमी हो रही है।
  • विटामिन `डी´ की प्रचुर मात्रा शरीर में रहने से चेहरा भरा-भरा, चमक लिए रहता है।
  • पर्दे में रहने वाली अधिकांश स्त्रियां विटामिन `डी´ की कमी की शिकार रहती हैं।
  • जिन रोगियों को विटामिन `डी´ की कमी से अस्थिमृदुलता तथा अस्थि शोथ रहता है वे अक्सर धनुवार्त के शिकार भी हो जाते हैं।

  • भारत में विटामिन `डी´ की कमी को दूर करने के लिए बच्चे को बचपन से ही मछली का तेल पिलाना हितकारी होता है।
  • बच्चों, गर्भावस्था और दूध पिलाने की अवस्था में विटामिन `डी´ का सेवन बहुत जरूरी होता है।
  • व्यक्ति को बचपन के बाद जवानी और बुढ़ापे में भी मछली का तेल नियमित रूप से पिलाते रहना चाहिए। इससे शरीर में विटामिन `डी´ की पर्याप्त मात्रा बनी रहती है।
  • बुढ़ापे में विटामिन `डी´ की कमी हो जाने पर जोड़ों का दर्द प्रारंभ हो जाता है।
  • विटामिन `डी´ की कमी से हल्की सी दुर्घटना हो जाने पर भी हडि्डयां टूट जाती हैं।
  • विटामिन `डी´ की कमी से बच्चों की खोपड़ी बहुत बड़ी तथा चौकोर सी हो जाती है।
  • विटामिन `डी´ की कमी से बच्चों के पुट्ठे कमजोर हो जाते हैं।
  • विटामिन `डी´ की कमी से बच्चों का चेहरा पीला, निस्तेज, कान्तिहीन दृष्टिगोचर होने लगता है।

  • विटामिन `डी´ की कमी के कारण बच्चा बिना कारण रोता रहता है।
  • विटामिन `डी´ की कमी से बच्चे का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है तथा उसको कुछ भी अच्छा नहीं लगता है।
  • यदि वयस्कों के शरीर में विटामिन `डी´ की कमी हो जाये तो प्रारंभ में उनको कमर और कुल्हों की वेदना सताती है।
  • यदि वयस्कों को विटामिन-डी की अत्यधिक कमी हो जाये तो उनके पेडू और कूल्हे की हडि्डयां मुड़कर कुरूप हो जाती हैं।
  • शरीर में विटामिन `डी´ की कमी से सीढ़ियां चढ़ने पर रोगी को कष्ट होता है।
  • शीतपित्त रोग के पीछे शरीर में विटामिन `डी´ की कमी होती है अत: इस रोग की औषधियों के साथ विटामिन `डी´ का प्रयोग भी लाभ प्रदान करता है।
  • विटामिन `डी´ की कमी को दूर करने के लिए कच्चा अण्डा प्रयोग करना हितकर होता है।
  • सर्दियों तथा बरसात के मौसम में बच्चों, बूढ़ों तथा जवानों को समान रूप से विटामिन `डी´ की अधिक आवश्यकता रहती है।

  • विटामिन `डी´ की अधिकता से दिमाग की नसें शक्तिशाली और लचीली हो जाती हैं।
  • विटामिन `डी´ सब्जियों में नहीं पाया जाता है।
  • अण्डा, मक्खन, दूध, कलेजी में विटामिन `डी´ ज्यादा मात्रा में रहता है।
  • ग्रामीण लोगों को सूर्य की किरणों से पर्याप्त विटामिन `डी´ मिल जाता है।
  • ग्रामीण लोगों की अपेक्षा शहरी लोग अधिक विटामिन `डी´ की कमी के शिकार होते हैं।
  • पुरुषों को प्रतिदिन 400 से 600 यूनिट विटामिन `डी´ की आवश्यकता होती है। दूध पीते बच्चों को भी इतनी ही आवश्यकता होती है।
  • अस्थिशोथ (रिकेट्स) तथा निर्बलता में 4 से 20 हजार अंतर्राष्ट्रीय यूनिट विटामिन `डी´ की आवश्यकता होती है।
कैल्शियमयुक्त खाद्य (प्रति 100 ग्राम)

Friday, January 3, 2020

Vitamin K introduction, causes, symptoms, sources.

परिचय-
विटामिन `के´ शरीर के लिए बहुत जरूरी विटामिन होता है। शरीर में कहीं से भी होने वाले रक्तस्राव को रोकने की इसमें अदभुत क्षमता होती है। इसकी कमी से शरीर में अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

विटामिन `के´ की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-
  • खून का पतला होना।
  • खून में प्रोथेम्बिक तत्व की कमी होना।
  • रक्तस्राव होना।
विटामिन `के´ युक्त खाद्य पदार्थ-
नोट-
जिन पौधों में क्लोरोफिल होता है, उसमें विटामिन `के´ अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है।

विटामिन `के´ से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य-
  • विटामिन `के´ पानी में घुल जाता है।
  • विटामिन `के´ नीबू-संतरा, रसदार फल, हरी सब्जियां, पालक, टमाटर में अधिक पाया जाता है।
  • विटामिन `के´ रक्त के संतुलन तथा प्रवाह को अपने प्रभाव में रखता है।
  • घातक शस्त्रों की चोट से निकलने वाले रक्त को रोकने के लिए इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया जाता है।
  • रक्तस्राव वाले रोगों में शीघ्र लाभ के लिए हमेशा विटामिन `के´ युक्त इंजेक्शन का ही प्रयोग करना चाहिए टैबलेट का नहीं।
  • विटामिन `के´ नियमित दो मिलीग्राम दिन में 3 बार खिलाने से प्रोथोम्बिन नॉर्मल हो जाता है।
  • विटामिन `के´ की कमी से शरीर का खून पतला हो जाता है।
  • नकसीर विटामिन `के´ कमी से बढ़ती है।
  • विटामिन `के´ चूना यानि कैल्शियम के संयोग से तीव्रता से क्रियाशील होता है।
  • खून का न जमना अथवा देर से जमना जाहिर करता है कि शरीर में विटामिन `के´ की अत्यधिक कमी हो चुकी है।
  • विटामिन `के´ पाचनक्रिया सुधारने के लिए सक्रिय योगदान देता है।
  • नवजात शिशु के शल्यक्रम में सर्वप्रथम विटामिन `के´ का प्रयोग करना पड़ता है।
  • नवजात शिशुओं के पीलिया रोग में विटामिन `के´ का प्रयोग करना हितकर होता है।
  • विटामिन `के´ पीले रंग के कणों में उपलब्ध होता है।
  • वयस्क रोगियों को रुग्णावस्था (रोग की अवस्था में) में विटामिन `के´ कम से कम 10 मिलीग्राम तथा अधिक से अधिक 300 मिलीग्राम प्रतिदिन की एक या अधिक मात्रा देनी चाहिए।
  • यदि विटामिन `के´ इंजेक्शन के रूप में उपलब्ध हो तो प्रतिदिन एक एम.एल ही रुग्णावस्था (रोग की अवस्था में) में देना पर्याप्त है। आवश्यकता पड़ने पर यह मात्रा दोहराई भी जा सकती है।
  • किसी भी प्रकार के अधिक स्राव में विटामिन `के´ नियमपूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। इसके साथ यदि कैल्शियम और विटामिन सी प्रयोग किया जाए तो और भी अच्छा लाभ होता है।
  • यदि यकृत रोगग्रस्त हो चुका हो और रक्तस्राव (खून बहने) होने लगे तो विटामिन `के´ का प्रयोग करना चाहिए।
  • प्रसव से पहले विटामिन `के´ का प्रयोग करने से प्रसवकाल में रक्तस्राव कम होता हैं
  • ऑप्रेशन के पूर्व तथा ऑप्रेशन के बाद रक्तस्राव न होने देने अथवा कम होने के लिए विटामिन `के´ का प्रयोग किया जाता है।
  • शरीर में गांठे पड़ जाने पर विटामिन `के´ की आवश्यकता पड़ती है।
  • हाइपोप्रोथोम्बेनेविया रोग में विटामिन `के´ के प्रयोग से आराम मिल जाता है।
  • हेमाटेमेसिस रोग में विटामिन `के´ का प्रयोग लाभ देता है।
  • शीतपित्त तथा क्षय (टी.बी.) रोगों में विटामिन `के´ का प्रयोग लाभ प्रदान करता है।
  • रक्तप्रदर में विटामिन `के´ का प्रयोग करने से लाभ होता है।
  • खून को जमाने में विटामिन `के´ का प्रयोग सर्वोत्तम प्रभाव रखता है।
  • प्रोथोम्बिन की कमी विटामिन `के´ की वजह से होती है।
  • आंतड़ियों के घाव तथा आंतड़ियों की सूजन विटामिन `के´ की कमी से होती है। आंतड़ियों में पित्त का अवशोषण न हो पाने की वजह से भी विटामिन `के´ की शरीर में कमी हो जाती है।

Tuesday, December 24, 2019

विटामिन `एफ´vitamin F Introduction, Symptoms, Causes. Requirements


विटामिन `एफ´ सामान्यत: तेल युक्त बीजों में पाया जाता है।
  • विटामिन `एफ´ घी, तेल और चर्बी में नहीं पाया जाता है।
  • विटामिन `एफ´ की कमी हो जाने से प्रोस्टेट-ग्लैण्ड की शोथ (सूजन) हो जाती है।
  • यदि शरीर में विटामिन `एफ´ की कमी हो जाए तो शरीर में स्थित अन्य विटामिन विशेष करके विटामिन `ए´, `डी´, `ई´ और `के´ शरीर का अंश नहीं बन पाते हैं।
  • भारत में अभी तक विटामिन `एफ´ का प्रचलन नहीं है जबकि इसकी खोज हुए वर्षों हो चुके हैं। विदेशों में यह प्रयोग हो रहा है, विशेषकर अमरीका में अत्यधिक प्रचलन में है।
  • विटामिन `एफ´ हाई ब्लडप्रेशर का रोग कम करता है।
  • विटामिन `एफ´ बुढ़ापे के रोगों के लिए रामबाण साबित होता है।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से आयु बढ़ती है।
  • यह सूरजमुखी के फूलों के बीजों में अधिक मात्रा में पाया जाता है।
  • क्षय रोग के लिए कद्दू और उसके बीज अति लाभदायक होते हैं, क्योंकि उनमें विटामिन `एफ´ काफी मात्रा में पाया जाता है।
  • विटामिन `एफ´ की शरीर में कमी हो जाने पर बाल खुश्क, खुरदरे तथा निर्जीव से हो जाते हैं।
  • विटामिन `एफ´ की कमी से पित्ताशय में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
  • विटामिन `एफ´ की कमी से मूत्र रुक जाता है क्योंकि प्रोस्टेट ग्लैण्ड की सूजन उत्पन्न हो जाती है।
  • अगर त्वचा की पपड़ियां उतर रही हों तो तुरन्त समझना चाहिए कि शरीर में विटामिन `एफ´ की कमी हो चुकी है।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से बुढ़ापे में प्रोस्टेट-ग्लैण्ड का रोग हो जाता है और रोगी की संभोग शक्ति बढ़ जाती है।
  • बुढ़ापे में विटामिन `एफ´ के प्रयोग से रक्तवाहिनियों की कठोरता समाप्त हो जाती है और रक्तवाहिनियां नरम-मुलायम हो जाती हैं।
  • विटामिन `एफ´ रक्त में कोलोस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है।
  • कद्दू के बीजों की गिरी में विटामिन `एफ´ काफी मात्रा में विद्यमान होता है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सक हजारों वर्षा से कद्दू के बीजों का चिकित्सा में प्रयोग करते आ रहे है, जाहिर है वे कद्दू के बीजों की मींगी में स्थित क्षय रोग (टी.बी.) को दूर करने वाली शक्ति से परिचित रहे होंगे-जबकि चिकित्सा विज्ञान ने आज खोज निकाला है कि कद्दू की मींगी में क्षय रोग को समाप्त करने के लिए विटामिन `एफ´ होता है।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से हृदय शक्तिशाली हो जाता है और हृदय के कई विकार शान्त हो जाते हैं।
  • एक्जिमा रोग का कारण शरीर में विटामिन `एफ´ की कमी हो जाना भी होता है।
  • राक्षसी भूख का एक कारण शरीर में विटामिन `एफ´ की कमी भी होती है।

  • गुर्दों के रोग विटामिन `एफ´ की कमी के कारण होते हैं।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से सिर के बाल सुन्दर और चमकीले हो जाते हैं।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से शरीर में चुस्ती-फुर्ती और रक्त का संचार होता है।
  • कद्दू के बीजों की गिरी प्रयोग करने से पागलों का पागलपन भी ठीक हो जाता है। कद्दू के बीज में विटामिन `एफ´ होता है।
  • कद्दू की मींगी अनिद्रा रोग को ठीक कर देती है।
  • कद्दू की मींगी का प्रयोग करने से फेफड़ों से रक्त आना बन्द हो जाता है।
  • कद्दू की मींगी दिमाग की खुश्की और गर्मी के ज्वर का नाश करती है।
  • Tuesday, December 10, 2019

    विटामिन एच Vitamin 'H' Introduction & Sources


    परिचय-
    विटामिन एच को बायोटिन भी कहा जाता है। यह भी विटामिन बी-काम्लेक्स परिवार का ही एक सदस्य है। इसकी कमी से शरीर में रक्ताल्पता (खून की कमी), और रक्त में लाल कणों का अभाव पैदा हो जाता है। त्वचा पर इसका प्रभाव दिखाई देने लगता है। इसके न रहने पर त्वचा पीली या सफेद सी नजर आने लगती है। इसके न रहने पर सीरम कोलेस्ट्रोल की वृद्धि हो जाती है। विटामिन एच के प्रयोग से जल्दी ही इसकी कमी से होने वाले समस्त विकारों से छुटकारा मिल जाता है। शरीर में रक्ताल्पता (खून की कमी) तो मात्र 6-8 दिन के प्रयोग से ही समाप्त होती देखी गई है। रक्ताल्पता (खून की कमी) दूर होते ही त्वचा पर उभरी सफेदी अथवा पीलापन खुद ही दूर हो जाता है और रोगी अपने अन्दर नई ताजगी स्फूर्ति अनुभव करने लगता है। सीरम कोलेस्ट्रॉल की वृद्धि भी इसके कुछ दिनों के प्रयोग से संतुलित हो जाती है। अत: विटामिन बी-काम्पलेक्स का यह सदस्य अन्य विटामिनों की भांति महत्व ही नहीं रखता बल्कि जीवन शक्ति भी देता है।


    एडेनिलिक एसिड-
    एडेनिलिक एसिड भी विटामिन बी-काम्पलेक्स परिवार का विशेष सदस्य है। यह यीस्ट में पाया जाता है। पेलाग्रा रोग तथा श्लेष्मकला के जख्म आदि में इसका प्रयोग करने से अतिशय गुणकारी प्रभाव पैदा होता है। इसके प्रभाव से विष लक्षण होना भी संभावित है अत: इसका प्रयोग पूर्ण सावधानी और सतर्कता से करना चाहिए।
    कोलीन-coline
    कोलीन भी विटामिन बी-काम्पलेक्स परिवार का सदस्य है। यकृत रोगों पर इसका प्रभाव होता है विशेष करके जब यकृत में चर्बी जमा हो जाती है। शरीर में इसकी उपस्थिति से यकृत सम्बंधी रोगों पर रोक लग जाती है अर्थात् यकृत विकार नहीं हो पाते हैं।

    फोलिक एसिड-
    फोलिक एसिड विटामिन बी-काम्पलेक्स का ही एक शक्तिशाली सदस्य है जो मैक्रोसाइटिक एनीमिया में सफलतापूर्वक प्रयोग की जा रही है। यह पशुओं के यकृत, सोयाबीन, हरी साग, सब्जियां, सूखे मटर, दालेंपालक, चौलाई आदि में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। फोलिक एसिड को आयरन के साथ देने से अधिक शक्तिशाली प्रभाव पैदा होता है। यह कृत्रिम विधियों से बनाया जाता है। प्रारंभ में इसको पालक की हरी पत्तियों में पाया गया था। पालक इसका प्रमुख स्रोत है। इसकी टिकिया तथा इंजेक्शन दोनों उपलब्ध हैं। संग्रहणी, स्प्रू, पुराने दस्तों के बाद होने वाली खतरनाक रक्ताल्पता (खून की कमी) के लिए फोलिक एसिड का प्रयोग रामबाण सिद्ध होता है। गर्भावस्था में होने वाली खून की कमी के लिए इसका प्रयोग करना लाभकारी रहता है। वैसे गर्भावस्था में फोलिक एसिड प्रारंभ से ही देना शुरू कर देना चाहिए। इसको अकेले, आयरन के साथ अथवा लीवर एक्सट्रैक्ट के साथ देना चाहिए। इन दोनों के साथ यह और भी अधिक शक्ति संपन्न हो जाता है। फोलिक एसिड नारंगी रंग का दानेदार फीका पाउडर होता है। स्वस्थ शरीर में इसकी सामान्य मात्रा 5 से 20 मिलीग्राम तथा रोगावस्था में 100 से 150 मिलीग्राम तक होती है।

    Tuesday, December 3, 2019

    Importance of Vitamin A in our life and their Sources, Diseases due to deficiency of Vitamin 'A, विटामिन `ए´ की कमी से होने वाले रोग-

    विटामिन `ए´ की कमी से होने वाले रोग-


    • फेफड़े व सांस की नली के रोग।
    • सर्दी-जुकाम
    • नाक-कान के रोग।
    • हड्डी व दांतों का कमजोर हो जाना।
    • त्वचा का खुरदरा होना, पपड़ी उतरना।
    • चर्म रोग, फोड़े-फुंसी, कील-मुंहासे, दाद, खाज।
    • जांघ व कमर के ऊपरी भाग पर बालों के स्थान मोटे हो जाना।
    • आंखों का तेज प्रकाश सहन न कर पाना, शाम व रात को कम दिखाई देना या अंधा हो जाना।
    • गुर्दे या मूत्राशय में पथरी बन जाना।
    • शरीर का वजन घट जाना।
    • नाखून आसानी से टूट जाना।
    • कब्ज होना
    • स्त्री-पुरुष की जननेद्रियां कमजोर पड़ जाना।
    • तपेदिक (टी.बी.)
    • संग्रहणी, जलोदर।

    विटामिन-ए से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें-
    • विटामिन-`ए´ का आविष्कार 1931 में हुआ था।
    • विटामिन-`ए´ जल में घुलनशील है।
    • विटामिन-`ए´ तेल और वसा में घुल जाता है।
    • विटामिन-`ए´ ‘शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता देता है।
    • नन्हें बच्चों को विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
    • गर्भावस्था में स्त्री को विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
    • शरीर में संक्रामक रोगों के हो जाने पर विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
    • विटामिन `ए´ की कमी से बहरापन होता है।
    • सर्दी, खांसी, जुकाम, नजला जैसे रोग विटामिन `ए´ की कमी से होते हैं।
    • फेफड़ों के संक्रमण विटामन `ए´ की कमी से होते हैं।
    • विटामिन `ए´ की कमी से रोगी तेज प्रकाश सहन नहीं कर पाता है।
    • विटामिन `ए´ की कमी से कील-मुंहासे आदि कई चर्मरोग हो जाते हैं।
    • विटामिन `ए´ की कमी से आंखों में आंसू सूख जाते हैं।
    • विटामिन `ए´ की कमी से नाखून आसानी से टूटने लगते हैं।
    • विटामिन `ए´ की कमी से आंखों का रतौंधी रोग हो जाता है।
    • विटामिन `ए´ की कमी से अनेक आंखों के रोग आ घेरते हैं।
    • विटामिन `ए´ की कमी से दांत कमजोर हो जाते हैं और दांतों का एनामेल बनने में रुकावट हो जाती है।
    • दांतों में गड्ढे विटामिन `ए´ की कमी से होते हैं।
    • विटामिन `ए´ की कमी से पुरुष के जननांगों पर प्रभाव पड़ता है।

    • साइनस, नथुने, नाक, कान और गले, शिराओं, पतली रक्त वाहिनियों, माथे की रक्त वाहिनियों के संक्रमण विटामिन `ए´ की पूर्ति करने से दूर हो जाते हैं।
    • स्कारलेट फीवर विटामिन `ए´ देने से ठीक हो जाता है।
    • विटामिन `ए´ को संक्रमण विरोधी विटामिन की संज्ञा दी जाती है।
    • विटामिन `ए´ की कमी से बच्चों की बढ़त थम जाती है।
    • बच्चों को एक हजार से लेकर तीन हजार यूनिट आई, प्रतिदिन विटामिन `ए´ की आवश्यकता होती है।
    • विटामिन `ए´ की कमी दिमाग की 8वीं नाड़ी पर बुरा प्रभाव डालती है।
    • विटामिन `ए´ के प्रयोग से गुर्दों की पथरी का डर नहीं रहता। पथरी रेत के कण जैसी बनकर मूत्र से निकल जाती है।
    • गिल्हड़ (घेंघा) रोग विटामिन `ए´ की कमी से होता है।
    • दिल धड़कने वाले रोगी को विटामिन-ए´ के साथ विटामिन-बी1 भी देना चाहिए।

    • विटामिन-`ए´ की कमी से स्त्री के जननांगों पर घातक प्रभाव पड़ता है।
    • विटामिन-`ए´ की कमी से स्त्री का डिम्बाशय सिकुड़ जाता है।
    • विटामिन-`ए´ की कमी से पुरुष के अण्डकोष सिकुड़ जाते हैं।
    • विटामिन-`ए´ और `ई´ शरीर में घट जाने पर स्त्री और पुरुषों की संभोग करने की इच्छा नहीं रहती तथा सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है।
    • विटामिन-`ए´ और `ई´ की कमी से पिट्यूटरी ग्लैण्ड की सक्रियता में बाधा हो जाती है।
    • विटामिन-`ए´ से धमनियां और शिराएं मुलायम रहती हैं।
    • विटामिन-`ए´ की कमी से बाल झड़ने लगते हैं।
    • मछली के तेल में विटामिन-`ए´ सबसे अधिक होता है।
    • विटामिन-`ए´ की कमी से सिर के बाल खुरदरे हो जाते हैं।
    • विटामिन-`ए´ की कमी से भूख घट जाती है।
    • विटामिन-`ए´ की कमी से मौसमी एलर्जी होती है।
    • विटामिन-`ए´ की कमी से वजन गिर जाता है।

    विटामिन `´ युक्त खाद्य
    (प्रति 100 ग्राम)
    क्र.स.
    खाद्य
    यूनिट
    1.
    हरा धनिया
    10000 अ.ई.
    2.
    पालक
    5500 अ.ई.
    3.
    पत्तागोभी
    2000 अ.ई.
    4.
    ताजा पोदीना
    2500 अ.ई.
    5.
    हरी मेथी
    4000 अ.ई.
    6.
    मूली के पत्ते
    6500 अ.ई.
    7.
    पका पपीता
    2000 अ.ई.
    8.
    टमाटर
    300 अ.ई.
    9.
    गाजर
    3000 अ.ई.
    10.
    पका आम
    45000 अ.ई.
    11.
    काशीफल (सीताफल)
    1000 अ.ई.
    12.
    हालीबुट लीवर ऑयल (मात्रा एक चम्मच)
    60000 अ.ई.
    13.
    शार्क लीवर ऑयल (मात्रा एक चम्मच)
    6000 अ.ई.
    14.
    बकरी की कलेजी
    22000 अ.ई.
    15.
    दूध
    200 अ.ई.
    16.
    अण्डा
    2000 अ.ई.
    17.
    मक्खन
    2500 अ.ई.
    18.
    घी
    2000 अ.ई.
    19.
    भेड़ की कलेजी
    22000 अ.ई


    निम्नलिखित खाद्य-पदार्थों में विटामिन-`ए´ अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है। जिस रोगी को विटामिन-`ए´ की कमी हो जाए उसे नीचे लिखी तालिका से चुनकर खाद्य-पदार्थ प्रयोग कराना अतिशय गुणकारी होता है-