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Thursday, December 5, 2019
Wednesday, December 4, 2019
Tuesday, December 3, 2019
Importance of Vitamin A in our life and their Sources, Diseases due to deficiency of Vitamin 'A, विटामिन `ए´ की कमी से होने वाले रोग-
विटामिन `ए´ की कमी से होने वाले रोग-
विटामिन-ए से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें-
- फेफड़े व सांस की नली के रोग।
- सर्दी-जुकाम।
- नाक-कान के रोग।
- हड्डी व दांतों का कमजोर हो जाना।
- त्वचा का खुरदरा होना, पपड़ी उतरना।
- चर्म रोग, फोड़े-फुंसी, कील-मुंहासे, दाद, खाज।
- जांघ व कमर के ऊपरी भाग पर बालों के स्थान मोटे हो जाना।
- आंखों का तेज प्रकाश सहन न कर पाना, शाम व रात को कम दिखाई देना या अंधा हो जाना।
- गुर्दे या मूत्राशय में पथरी बन जाना।
- शरीर का वजन घट जाना।
- नाखून आसानी से टूट जाना।
- कब्ज होना।
- स्त्री-पुरुष की जननेद्रियां कमजोर पड़ जाना।
- तपेदिक (टी.बी.)।
- संग्रहणी, जलोदर।
- विटामिन-`ए´ का आविष्कार 1931 में हुआ था।
- विटामिन-`ए´ जल में घुलनशील है।
- विटामिन-`ए´ तेल और वसा में घुल जाता है।
- विटामिन-`ए´ ‘शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता देता है।
- नन्हें बच्चों को विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
- गर्भावस्था में स्त्री को विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
- शरीर में संक्रामक रोगों के हो जाने पर विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
- विटामिन `ए´ की कमी से बहरापन होता है।
- सर्दी, खांसी, जुकाम, नजला जैसे रोग विटामिन `ए´ की कमी से होते हैं।
- फेफड़ों के संक्रमण विटामन `ए´ की कमी से होते हैं।
- विटामिन `ए´ की कमी से रोगी तेज प्रकाश सहन नहीं कर पाता है।
- विटामिन `ए´ की कमी से कील-मुंहासे आदि कई चर्मरोग हो जाते हैं।
- विटामिन `ए´ की कमी से आंखों में आंसू सूख जाते हैं।
- विटामिन `ए´ की कमी से नाखून आसानी से टूटने लगते हैं।
- विटामिन `ए´ की कमी से आंखों का रतौंधी रोग हो जाता है।
- विटामिन `ए´ की कमी से अनेक आंखों के रोग आ घेरते हैं।
- विटामिन `ए´ की कमी से दांत कमजोर हो जाते हैं और दांतों का एनामेल बनने में रुकावट हो जाती है।
- दांतों में गड्ढे विटामिन `ए´ की कमी से होते हैं।
- विटामिन `ए´ की कमी से पुरुष के जननांगों पर प्रभाव पड़ता है।
- साइनस, नथुने, नाक, कान और गले, शिराओं, पतली रक्त वाहिनियों, माथे की रक्त वाहिनियों के संक्रमण विटामिन `ए´ की पूर्ति करने से दूर हो जाते हैं।
- स्कारलेट फीवर विटामिन `ए´ देने से ठीक हो जाता है।
- विटामिन `ए´ को संक्रमण विरोधी विटामिन की संज्ञा दी जाती है।
- विटामिन `ए´ की कमी से बच्चों की बढ़त थम जाती है।
- बच्चों को एक हजार से लेकर तीन हजार यूनिट आई, प्रतिदिन विटामिन `ए´ की आवश्यकता होती है।
- विटामिन `ए´ की कमी दिमाग की 8वीं नाड़ी पर बुरा प्रभाव डालती है।
- विटामिन `ए´ के प्रयोग से गुर्दों की पथरी का डर नहीं रहता। पथरी रेत के कण जैसी बनकर मूत्र से निकल जाती है।
- गिल्हड़ (घेंघा) रोग विटामिन `ए´ की कमी से होता है।
- दिल धड़कने वाले रोगी को विटामिन-ए´ के साथ विटामिन-बी1 भी देना चाहिए।
- विटामिन-`ए´ की कमी से स्त्री के जननांगों पर घातक प्रभाव पड़ता है।
- विटामिन-`ए´ की कमी से स्त्री का डिम्बाशय सिकुड़ जाता है।
- विटामिन-`ए´ की कमी से पुरुष के अण्डकोष सिकुड़ जाते हैं।
- विटामिन-`ए´ और `ई´ शरीर में घट जाने पर स्त्री और पुरुषों की संभोग करने की इच्छा नहीं रहती तथा सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है।
- विटामिन-`ए´ और `ई´ की कमी से पिट्यूटरी ग्लैण्ड की सक्रियता में बाधा हो जाती है।
- विटामिन-`ए´ से धमनियां और शिराएं मुलायम रहती हैं।
- विटामिन-`ए´ की कमी से बाल झड़ने लगते हैं।
- मछली के तेल में विटामिन-`ए´ सबसे अधिक होता है।
- विटामिन-`ए´ की कमी से सिर के बाल खुरदरे हो जाते हैं।
- विटामिन-`ए´ की कमी से भूख घट जाती है।
- विटामिन-`ए´ की कमी से मौसमी एलर्जी होती है।
- विटामिन-`ए´ की कमी से वजन गिर जाता है।
विटामिन `ए´ युक्त खाद्य
(प्रति 100 ग्राम)
| ||
क्र.स.
|
खाद्य
|
यूनिट
|
1.
|
हरा धनिया
|
10000 अ.ई.
|
2.
|
पालक
|
5500 अ.ई.
|
3.
|
पत्तागोभी
|
2000 अ.ई.
|
4.
|
ताजा पोदीना
|
2500 अ.ई.
|
5.
|
हरी मेथी
|
4000 अ.ई.
|
6.
|
मूली के पत्ते
|
6500 अ.ई.
|
7.
|
पका पपीता
|
2000 अ.ई.
|
8.
|
टमाटर
|
300 अ.ई.
|
9.
|
गाजर
|
3000 अ.ई.
|
10.
|
पका आम
|
45000 अ.ई.
|
11.
|
काशीफल (सीताफल)
|
1000 अ.ई.
|
12.
|
हालीबुट लीवर ऑयल (मात्रा एक चम्मच)
|
60000 अ.ई.
|
13.
|
शार्क लीवर ऑयल (मात्रा एक चम्मच)
|
6000 अ.ई.
|
14.
|
बकरी की कलेजी
|
22000 अ.ई.
|
15.
|
दूध
|
200 अ.ई.
|
16.
|
अण्डा
|
2000 अ.ई.
|
17.
|
मक्खन
|
2500 अ.ई.
|
18.
|
घी
|
2000 अ.ई.
|
19.
|
भेड़ की कलेजी
|
22000 अ.ई
|
निम्नलिखित खाद्य-पदार्थों में विटामिन-`ए´ अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है। जिस रोगी को विटामिन-`ए´ की कमी हो जाए उसे नीचे लिखी तालिका से चुनकर खाद्य-पदार्थ प्रयोग कराना अतिशय गुणकारी होता है-
- दूध
- मक्खन
- मलाई
- केला
- नारंगी
- गाजर
- ककड़ी
- हरी साग भाजी
- शकरकन्द
- चुकन्दर
- टमाटर
- पालक
- सहजन
- पत्तागोभी
- सरसों का साग
- ताजे फल
- नींबू
- मछली
- बकरे की अण्डा ग्रंथि
- बाजरा
- हाथ का कूटा हुआ चावल
- मौसमी
- नाशपाती
- शाकाहारी भोजन
- बेल
- शार्क लीवर ऑयल
- अण्डा
- अण्डे की जर्दी
- मछली का जिगर
- हालीबुट लीवर ऑयल
- बकरे की कलेजी
- हरा धनिया
- हरा पोदीना
- हरी मेथी
- मूली के पत्ते
- पका आम
- काशीफल
Saturday, November 30, 2019
सामान्य-ज्वर (Continued Fever) Causes, Symptoms, Medicines
कारण-इस ज्वर का कोई विशेष कारण नहीं होता । सर्दी लग जाना, अधिक परिश्रम
असंयमित खान-पान तथा मानसिक-उद्वेग आदि से यह ज्वर उत्पन्न हो सकता है।
लक्षण-इस ज्वर के प्रारम्भ में सम्पूर्ण शरीर में दर्द, सिर में पीड़ा, ठण्ड लगना अथवा
कम्प, वमन आदि लक्षण प्रकट होते हैं । फिर शरीर का तापमान अचानक ही बढ़ जाता है तथा
तीव्र प्यास एवं प्रबल सिरोव्यथा की प्रधानता हो जाती है । नाड़ी की चाल तीव्र रहती है. जीभ
पर मैल चढ़ जाता है । शरीर का तापमान 102° से 104° डिग्री तक बढ़ जाता है । यह उच्च
तापक्रम कई दिनों तक एक जैसा बना रहकर, पांच-सात दिन बाद घटने लगता है। ऐसा ज्वा
प्रायः 10 दिनों से अधिक समय तक स्थायी नहीं रहता ।
चिकित्सा-इस रोग में लक्षणानुसार निम्नलिखित औषधियों का प्रयोग करना चाहिए।
फेरम फॉस 6x-यह हर प्रकार के ज्वरों की मुख्य-औषध है । ठण्ड का अनुभव, प्रदाह.
सर्दी, वात ज्वर आदि सभी स्थितियों तथा रोग की प्रारम्भिक अवस्था में इस औषध के प्रयोग
से रोग जड़ से दूर हो जाता है । यदि ज्वर के साथ अन्य उपसर्ग भी हों तो उनके लिए
सुनिर्वाचित औषध-लवण के साथ पर्यायक्रम से इसका प्रयोग करना चाहिए । नाड़ी की तीव्रता
तथा शारीरिक उत्ताप में वृद्धि-इस औषध के निर्देशक लक्षण हैं ।
केलि-म्यूर 6x-ज्वर-रोग में इस औषध का स्थान 'फेरम-फॉस' के बाद आता है।
जीभ पर सफेद मैल तथा कब्ज के लक्षण युक्त ज्वर में 'फेरम-फॉस' के साथ पर्याय-क्रम से
इसका प्रयोग करना चाहिए । प्रदाह तथा रक्त के जमाव की द्वितीयावस्था में यह औषध विशेष
हितकर है।
के लि-फॉस 6x-नाड़ी की गति में असमानता, स्नायविक-ज्वर, तीव्र उत्ताप एवं
स्नायविक-उत्तेजना के साथ कमजोरी के लक्षणों में 'फेरम-फॉस' के साथ पर्याय-क्रम से इसका
प्रयोग करना चाहिए । दुर्गन्धित तथा अत्यधिक मात्रा में आने वाले पसीना के लक्षणों में यह
विशेष हितकर है।
कैलि-सल्फ 6x-तीसरे प्रहर ज्वर का उत्ताप बढ़ जाना इस औषध का निर्देशक-लक्षण
हैं । यदि 'फेरम-फॉस' के सेवन से भी पसीना न आये तो इसके सेवन से पसीना आ जाता है।
रक्त के दूषित हो जाने के कारण आने वाले ज्वर में इसका प्रयोग हितकर सिद्ध होता है । शाम
से आधी रात तक बुखार का बढ़ना एवं उसके बाद घटने के लक्षणों में भी यह हितकर है।
नेट्रम-म्यूर 6x-ज्वर के आरम्भ में जीभ बहुत सूखी दिखाई दे, सर्दी के कारण ज्वर एवं
आँख-नाक से पानी जैसी पतली सर्दी के स्राव के लक्षणों में 'फेरम-फॉस' के साथ पर्याय-क्रम
इसका प्रयोग करना चाहिए। प्रात: से दोपहर तक ठण्ड का अनुभव, प्रात: 10 बजे से सिर-दद
का प्रारम्भ तथा उसके साथ प्यास, थकान एवं कमर के दर्द के लक्षणों में विशेष हितकर है।
निम्नलिखित लक्षणों में निम्नलिखित औषधियों का पर्याय-क्रम से अथवा मिश्रित रूप में
भी प्रयोग हितकर सिद्ध होता है-
फेरम-फॉस 6x, नेट्रम-म्यूर 6x-जब ज्वर चढ़ा हुआ हो एवं सिर में दर्द तथा प्रयास
की अधिकता हो।
फेरम-फॉस 6x, नेट्रम-सल्फ 6x-ज्वर, सिर-दर्द, व्याकुलता, वमन तथा कभी-कभी
दस्त भी हो जाने के लक्षणों में।
नेट्रम-म्यूर 6x, नेट्रम-सल्फ 6x-जिस समय ज्वर न हो तथा उसे रोकना आवश्यक
हो, साथ ही पहले क्विनीन का सेवन कराया जा चुका हो।
विशेष- सामान्य-ज्वर में फेरम-फॉस 12x, कैलि-म्यूर 3x तथा नेट्रम-सल्फ 3x
मिलाकर देने से शीघ्र लाभ होता है । इन औषधियों को दो-दो घण्टे बाद देना चाहिए । • यदि
इनसे लाभ न हो तो कैल्केरिया-फ्लोर 3x, कैलि-फॉस 3x अथवा 12x, फेरम-फॉस 12x,
कैलि-म्यूर 3x, कैलि-फॉस 3x, कैलि-सल्फ 3x, मैग्नेशिया-फॉस 3x, नेट्रम-फॉस 3x,
नेट्रम-सल्फ 3x, तथा साइलिसिया 12x-इन सबको एक साथ गुन-गुने पानी में घोलकर रख
लें तथा 2-2 घण्टे के अन्तर से एक-एक मात्रा पिलायें । • यदि बेहोशी हो तो इस नुस्खे में
नेट्रम-म्यूर 3x और मिला दें। इससे हर प्रकार के सामान्य ज्वर तथा मलेरिया ज्वर भी ठीक हो
जाते हैं। जब एक औषध के प्रयोग से लाभ न हो तभी दो अथवा अधिक औषधियों वाले
नुस्खों को प्रयोग में लाना चाहिए।
टिप्पणी-रोग की अवस्थानुसार अकेली दवाओं का प्रयोग उल्लिखित शक्ति से अधिक
उच्च शक्ति में भी किया जा सकता है।
आनुषंगिक-व्यवस्था- • यदि ज्वर में प्यास के लक्षण हों तो खौलते हुए पानी को
ठण्डा करके रोगी को इच्छित मात्रा में खूब पिलाना उचित रहता है ।
•पर्ल-बार्ली को सिझाकर छान लें तथा उस पानी में थोड़ा-सा नमक अथवा मिश्री के
साथ कागजी नीबू का रस मिलाकर देने से प्यास रुकती है तथा पेशाब भी खुलकर यथोचित
परिमाण में होता है।
Friday, November 29, 2019
Protein introduction, Benifits, Requirements, Sources
परिचय-
भोजन का मुख्य आवश्यक तत्व है- प्रोटीन। यही तत्व शरीर की कोशिकाओं अर्थात् मांस आदि का निर्माण करता है।
इसकी प्रचुर मात्रा भोजन में रहने से शरीर की कोशिकाओं का निर्माण और मरम्मत आदि का कार्य सुचारू रूप से जीवन भर चलता रहता हैं। प्रोटीन में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा गंधक के अंश मिले रहते हैं। इसमें फास्फोरस भी विद्यमान हो सकता है। प्रोटीन में नाइट्रोजन की अधिकता रहती है। प्रोटीन दो प्रकार का होता है (1) पशुओं से प्राप्त होने वाला (2) फल, सब्जियों तथा अनाज आदि से मिलने वाला। हालांकि शरीर में यदि प्रोटीन अधिक हो जाए तो मल द्वारा बाहर निकल आता है।
फिर भी दैनिक आवश्यकता के लिए नियमित प्रोटीन की आवश्यकता शरीर को रहती है लेकिन इस बात की ओर भी ध्यान देना अति आवश्यक है कि आवश्यकता से अधिक प्रोटीन लाभ की अपेक्षा शरीर को हानि भी पहुंचा सकता है परन्तु जब भोजन के बाद भी शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाए तो बाहर से कृत्रिम तरीके से निर्मित प्रोटीन से उस कमी की पूर्ति करना बहुत जरूरी होता हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति किलोग्राम वजन के अनुपात से मनुष्य को एक ग्राम प्रोटीन की आवश्कता होती हैं अर्थात यदि वजन 50 किलो है तो नित्य 50 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है। प्रोटीन शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन में मौजूद पाया जाता है। यदि दोनों को भोजन में एक साथ लिया जाए तो शरीर में प्रोटीन की प्रचुर मात्रा शामिल की जा सकती है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि शरीर में जीवनीय तत्वों की कमी न हो तो शरीर रोगों से बचा रहता है। संक्रमणजन्य रोगों से बचाव के लिए प्रोटीन की अधिक आवश्यकता होती है।
इसकी प्रचुर मात्रा भोजन में रहने से शरीर की कोशिकाओं का निर्माण और मरम्मत आदि का कार्य सुचारू रूप से जीवन भर चलता रहता हैं। प्रोटीन में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा गंधक के अंश मिले रहते हैं। इसमें फास्फोरस भी विद्यमान हो सकता है। प्रोटीन में नाइट्रोजन की अधिकता रहती है। प्रोटीन दो प्रकार का होता है (1) पशुओं से प्राप्त होने वाला (2) फल, सब्जियों तथा अनाज आदि से मिलने वाला। हालांकि शरीर में यदि प्रोटीन अधिक हो जाए तो मल द्वारा बाहर निकल आता है।
फिर भी दैनिक आवश्यकता के लिए नियमित प्रोटीन की आवश्यकता शरीर को रहती है लेकिन इस बात की ओर भी ध्यान देना अति आवश्यक है कि आवश्यकता से अधिक प्रोटीन लाभ की अपेक्षा शरीर को हानि भी पहुंचा सकता है परन्तु जब भोजन के बाद भी शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाए तो बाहर से कृत्रिम तरीके से निर्मित प्रोटीन से उस कमी की पूर्ति करना बहुत जरूरी होता हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति किलोग्राम वजन के अनुपात से मनुष्य को एक ग्राम प्रोटीन की आवश्कता होती हैं अर्थात यदि वजन 50 किलो है तो नित्य 50 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है। प्रोटीन शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन में मौजूद पाया जाता है। यदि दोनों को भोजन में एक साथ लिया जाए तो शरीर में प्रोटीन की प्रचुर मात्रा शामिल की जा सकती है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि शरीर में जीवनीय तत्वों की कमी न हो तो शरीर रोगों से बचा रहता है। संक्रमणजन्य रोगों से बचाव के लिए प्रोटीन की अधिक आवश्यकता होती है।
प्रोटीन के स्रोत-
अण्डे की सफेदी, दूध, दही, पनीर, मछली, मांस, यकृत, वृक्कों और दिमाग में सर्वोत्तम किस्म की प्रोटीन विद्यमान है। दालों, हरी सब्जियों और अनाजों में दूसरे किस्म का प्रोटीन पाया जाता है।
अण्डे में प्रोटीन
| ||
क्र.स.
|
अंडा
|
प्रोटीन
|
1.
|
पूर्ण अंडा
|
13.0 प्रतिशत
|
2.
|
अंडे की सफेदी
|
10.5 प्रतिशत
|
3.
|
अंडे की जर्दी
|
17.0 प्रतिशत
|
दूध में प्रोटीन
| ||
क्र.स.
|
प्राणी का नाम
|
प्रोटीन
|
1.
|
गाय का दूध
|
3.4 प्रतिशत
|
2.
|
बकरी का दूध
|
4.4 प्रतिशत
|
3.
|
भेड़ का दूध
|
6.7 प्रतिशत
|
4.
|
भैंस का दूध
|
5.9 प्रतिशत
|
5.
|
स्त्री का दूध
|
1.7 प्रतिशत
|
- बच्चों को प्रोटीन की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि उनका शरीर विकास कर रहा होता है।
- बुढ़ापे में भी शरीर को प्रोटीन की अत्यधिक आवश्यकता होती है क्योंकि यह एक ऐसी अवस्था होती है जब प्रोटीन जल्दी हजम हो जाता है। इस आयु में यदि प्रोटीन की मात्रा घट गई तो जीवन शक्ति का अभाव हो जाता है। इसलिए इस अवस्था में खाद्य पदार्थों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।
- गर्भावस्था में मां के साथ-साथ गर्भ में पल रहे बच्चे को भी प्रोटीन की अत्यधिक आवश्यकता होती है। प्रोटीन गर्भ में पल रहे बच्चे की शरीर के विकास में जरूरी होती है। फिर मां के स्वास्थ्य के लिए तो यह जरूरी है ही। प्रोटीन की कमी इस अवस्था में मां और गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकती है। अत: यह अति आवश्यक है कि गर्भावस्था में माता को प्रोटीनयुक्त खाद्य अधिक से अधिक प्रयोग कराया जाए।
- जिस प्रकार गर्भावस्था में माता को प्रोटीन की अधिक आवश्यकता होती है। ठीक उसी प्रकार दूध पिलाने वाली माता को भी प्रोटीन की आवश्यकता होती है। इस अवस्था में प्रोटीन की कमी मां और बच्चा दोनों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। दूध पिलाने वाली माताओं और गर्भवती स्त्री को दोनों प्रकार के प्रोटीन देने चाहिए।
- रोगों के बाद रोगी के शरीर की शक्ति क्षीण हो चुकी होती है। इस अवस्था में रोगी दीन-हीन व असहाय हो जाता है। रोगी के शरीर के तंतु, कोशिकाएं आदि काफी टूट-फूट चुके होते हैं अत: उन्हें नई जीवन शक्ति और मजबूती प्रदान करने की खातिर अधिकाधिक दोनों प्रकार के प्रोटीन देने चाहिए ताकि शरीर की खोई हुई शक्ति को पुन: प्राप्त कर सके। जिन लोगों को रोगों के बाद या ऑप्रेशन के बाद उचित खाद्य प्रोटीन नहीं मिलते उनके पुन: रोगी हो जाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। रोगी का शरीर पहले ही रोग से टूट चुका होता है। उसके बाद खान-पान सही नहीं होने से शरीर की शक्ति और अधिक तेजी से नष्ट होती है और रोग दुबारा आ घेरता है।
Vitamins E deficiency, Cause of many Diseases
विटामिन `ई´ की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-
विटामिन `ई` युक्त खाद्यों की तालिका-
विटामिन `ई´ की महत्वपूर्ण बातें-
- विटामिन `ई´ वसा में घुलनशील होता है।
- अंकुरित अनाज तथा शाक-भाजियों में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
- अंतरिक्ष यात्रियों में ऑक्सीजन की अधिकता से रक्तहीनता का दोष पैदा हो जाता है जो विटामिन `ई´ से ठीक हो जाता है।
- विटामिन `ई´ में किसी भी प्रकार की वेदना को दूर करने का विशेष गुण रहता है।
- शरीर में विटामिन `ई´ की कमी हो जाने से किसी भी रोग का संक्रमण जल्दी लग जाता है।
- विटामिन `ई´ की कमी होते ही क्रमश: विटामिन `ए´ भी शरीर से नष्ट होने लगता है।
- गेहूं के तेल में विटामिन `ई´ भरपूर रहता है।
- सलाद, अण्डे तथा मांस आदि में विटामिन `ई´ बहुत ही कम मात्रा में पाया जाता है।
- स्त्रियों का बांझपन शरीर में विटामिन `ई´ की कमी के कारण होता है।
- विटामिन `ई´ को टेकोफेरोल भी कहा जाता है।
- विटामिन `ई´ का महिलाओं के बांझपन, बार-बार गर्भ गिर जाने, बच्चा मरा हुआ पैदा होने जैसे रोगों को रोकने के लिए सफलतापूर्वक पूरे संसार में प्रयोग किया जा रहा है।
- आग से जल जाने वाले रोगी के लिए विटामिन `ई´ ईश्वरीय वरदान कहा जाता है इसके प्रयोग से जले हुए रोगी को संक्रमण भी नहीं लगता है।
- प्रजनन अंगों पर विटामिन `ई´ विशेष रूप से प्रभाव पैदा करता है।
- विटामिन `ई´ पर ताप का कोई प्रभाव पैदा नहीं होता है।
- पुरुषों की नपुंसकता का एक कारण शरीर में विटामिन ई की कमी हो जाना भी होता है।
- बिनौले में पर्याप्त विटामिन `ई´ मौजूद रहता है।
- शिराओं के भंयकर घाव, गैंग्रीन आदि विटामिन `ई´ के प्रयोग से समाप्त हो जाते हैं।
- शरीर में विटामिन `ई´ पर्याप्त रहने पर विटामिन `ए´ की शरीर को कम आवश्यकता पड़ती है।
- हार्मोंस संतुलन के लिए विटामिन `ई´ का महत्वपूर्ण योगदान है।
- विटामिन `ई´ की कमी से थायराइड ग्लैण्ड तथा पिट्यूटरी ग्लैण्ड की क्रियाओं में बाधा उत्पन्न हो जाती है।
- विटामिन `ई´ की कमी से स्त्री के स्तन सिकुड़ जाते हैं और छाती सपाट हो जाती है।
- मानसिक रोगों से ग्रस्त रोगियों को विटामिन `ई´ प्रयोग कराने से लाभ होता है।
- स्त्रियों में कामश्वासना लोप हो जाने पर विटामिन `ई´ का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
Thursday, November 28, 2019
जबड़े की हड्डी का सड़ना (Caries or Necrosis) Homeopathic medicine
जबड़े की हड्डी का सड़ना (Caries or Necrosis)
परिचयः जबड़े की हड्डी के किसी भाग का मृत हो जाना जिसके चारों ओर का स्थान स्वस्थ रहता है, नेक्रोसिस (जबड़े की हड्डी का सड़ना) कहलाता है। यह मुख्यतः निम्न प्रकार का होता है-
1. एनेमिक नेक्रोसिस- खून की कमी से शरीर के प्रभावित भाग की रक्त आपूर्ति कम हो जाने से उस भाग में पैदा नैक्रोसिस।
2. एसेप्टिक नेक्रोसिस- संक्रमण से रहित होने वाला नैक्रोसिस।
3. चीजी नेक्रोसिस- ऐसा नेक्रोसिस जिसमें ऊतक पनीर के जैसा बन जाता है जैसाकि अक्सर क्षय रोग और सिफिलिस में देखा जाता है, किलाटी नेक्रोसिस।
4. कौगुलेशन नेक्रोसिस- ऐसा नेक्रोसिस जिसका परिगलित क्षेत्र जम जाता है, आतंची नेक्रोसिस।
6. इबोलिक नेक्रोसिस- अन्तःशल्य के परिणामस्वरूप होने वाला नेक्रोसिस।
7. फोकल नेक्रोसिस- छोटे-छोटे छितरे हुए क्षेत्रों में स्थिर नैक्रोसिस जो ज्यादा संक्रमण में देखे जाते हैं।
8. गम्मेटस नेक्रोसिस- सिफिलस के गम्मा में होने वाला नेक्रोसिस। Gummatous necrosis-
9. लिक्वीफैक्टिव नेक्रोसिस- ऊतकों के द्रवीकरण से होने वाला नेक्रोसिस।
10 मॉयस्ट नेक्रोसिस- नेक्रोसिस जिसके साथ मृत ऊतक कोमल और नम हो जाता है, आर्द नेक्रोसिस।
11. प्युट्रीफैक्टिव नेक्रोसिस- परजीवाणु विघटन के द्वारा उत्पन्न होने वाला नेक्रोसिस।
12. रेडियेशन नेक्रोसिस- विकिरण के प्रति अनावृत होने से उत्पन्न नेक्रोसिस।
13.थ्रॉम्बोटिक नेक्रोसिस- घनास्त्र या थ्रॉम्बस के बनने के कारण पैदा होने वाला नेक्रोसिस।
रोग और उसमें प्रयोग की जाने वाली औषधियां :-
1. ऐरम-ट्रिफाइलम :- जबड़े के जोड़ों में दर्द होने पर ऐरम-ट्रिफाइलम औषधि की 3 से 30 शक्ति का उपयोग करना हितकारी होता है। इसके प्रयोग से दर्द में आराम मिलता है।
2. फॉस्फोरस :- यदि किसी व्यक्ति के जबड़े के नीचे व बाएं भाग में किसी प्रकार का जख्म हो गया हो तो उसेफॉस्फोरस औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।
3. क्यूप्रम-मेटैलिकम :- पूरे जबड़े में ऐंठन सा दर्द होता है या नीचे के जबड़े में दर्द होता है। जबड़े का ऐसा दर्द जो हल्का सा छू भी दें तो दर्द तेज हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम-मेटैलिकम औषधि की 6 या 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।
4. पैसीफ्लोरा :- बच्चे में दांत निकलते समय कई प्रकार के रोग होते हैं। इन रोग में जबड़े की हड्डी का सड़ना भी एक एक प्रकार का रोग है। अत: दांत निकलते समय बच्चे के जबड़े में किसी प्रकार का कष्ट हो तो पैसीफ्लोराऔषधि के मूलार्क का प्रयोग करना हितकारी होता है।
5. हेक्ला-लावा :- जबड़े की हड्डी बढ़ जाने पर हैक्ला-लावा औषधि की 3x मात्रा का उपयोग करने से जबड़े की बढ़ी हुई हड्डी सामान्य हो जाती है।
6. पेट्रोलियम :- जबड़े का अपने स्थान से हट जाना या अटक जाना आदि रोग में पेट्रोलियम औषधि की 30 या 200 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।
7. हाइपेरिकम :- इस औषधि का प्रयोग जबड़ा अटक जाने पर करने से जबड़े का अटकना समाप्त होकर अपने सामान्य स्थिति में आ जाता है। जबड़ा अटकने पर रोगी को हाइपेरिकम औषधि की 6 शक्ति का सेवन करना चाहिए। इस औषधि की विशेष क्रिया स्नायु पर होती है। इसलिए चोट लगने के कारण स्नायु में उत्पन्न रोग में हाइपेरिकम औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
8. साइलीशिया :- किसी कारण से जबड़े की हड्डी अटक जाना या जबड़े के नीचे की हड्डी का जख्म होना या सूज जाने पर जबड़ें के रोग में रोगी को पहले ऊपर बताए गए औषधियों में से कोई भी औषधि दें। यदि उससे लाभ न मिले तो साइलीशिया औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।































